भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 348, कुल 1367 में से

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पृष्ठ 348

कबीर साहब, इस बाँसुरीकी प्रशंसा हंस कबीर किया करते हैं जिनको इसका ज्ञान है ।

जब प्रथम कबीर साहबका गोरखनाथसे सामना हुवा, गोरखनाथ कबीर साहबकी श्रेष्ठता तथा कीर्तिते अनभिन्न थे, तब गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, आओ हम तुम वाद-विवाद करें। उस समय गोरखनाथने अपना त्रिशूल गाड़कर कहा कि, आओ कबीर साहब ! उस त्रिशूलकी एक शाखापर बैठ जाओ मैं बैठता हूँ पीछे वाद-विवाद करेंगे, कबीर साहबने सूकते एक तारको आकाशकी ओर चलाया । और शून्यमें उस सूकते ऊपर बैठकर कहा कि, नाथजी ! आओ, हम और तुम इस सूतपर बैठकर वाद-विवाद करें क्योंकि, तुम्हारा त्रिशूल तो पृथ्वीसे लगा हुवा है । कबीर साहबकी यह लीला देखकर गोरखनाथजी दङ्ग हो गए ।

गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, मैं छिपता हूँ आप मुझे ढूँढ निकालें । गोरखनाथ मेंढक बनकर जलमें छिप गये कबीर साहब उस मेंढकको पकड़ लिये कहने लगे कि, अब किधर जाओगे, तब गोरखनाथ पुनः अपने असली रूपमें आ गए । पीछे कबीर साहबने कहा कि, अब मैं छिपता हूँ तुम ढूँढलो । कबीर साहबने जलमें डुबकी मारी । जल होकर जलके साथ मिल गए । गोरखनाथ ढूँढते २ थके तीनों लोकमें ढूँढते फिरे परन्तु कहीं पता नहीं लगा । पीछे विवश होकर बैठे कबीर साहबने देखा कि, अब तो गोरखनाथ हारके बैठ गए हैं उसी समय कमण्डुल के जलमेंसे कबीर साहब प्रगट होगए ।

गोरखनाथने कबीर साहबके पास दो सर्प भेजे । वे दोनों सोंप कबीर साहबके पास आए । आपने उनको अपने शरीरमें लगा लिया । बहुत विलंब हुवा पर पलटकर नहीं गए तब स्वयम् गोरखनाथजी कबीर साहबके गृह पधार कर पुकारा कि, कबीर साहब ! बाहर आइए । कबीर साहबने भीतरसे उत्तर दिया कि, नाथजी ! मेरे गृह दो अतिथि आए हैं मैं उनके सेवा सत्कारमें लगा हुवा हूँ । गोरखनाथने जाना कि, कबीर साहब कैसे प्रतिष्ठित पुरुष हैं । आपमें कौसी क्षमा तथा संतोष है । प्रथम तो गोरखनाथने कबीर साहबसे बहुत वाद विवाद किया बहुत कौतुक देखे पीछे भलीप्रकार जान लिया कि, आप अद्वितीय हैं मनुष्य मात्रमें दूसरा ऐसा कोई नहीं । कबीर साहबने गोरखनाथको भलीप्रकार संतुष्ट कर दिया बहुत कुछ कहा । सब कौतुक दिखलाए । गोरखनाथको भलीप्रकार निश्चय करा दिया कि, कबीर साहब स्वयम् अलख अविनाशी हैं । तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिर शिष्य होकर परमगति पागये । योगयुक्ति आदि सबको व्यर्थ जाना ।

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