भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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देते हैं । उनकी शिक्षा और बातोंसे उन्हें पहचान लेना चाहिये । ऐसा न हो कि, उनके धोखेमें आ जावें । ऐसे साधु कालपुरुषके दूत हैं उनसे सावधान रहे । जिस साधुमें अपने गुरुका ज्ञान हो, उस साधुकी शिक्षा मर्यादा तथा सेवा अपने गुरुके समान करे । धोखा धडी देनेवाले साधु, अपनी वार्तालापसे पहचाने जाते हैं ।

सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त समस्त भक्तियाँ जाल तथा बन्धनमें डालनेवाली हैं । कालपुरुषका विष, ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिकसे लेकर सारे जीवोंमें समाया हुवा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे कोई सत्यपदसे लग नहीं सकता, सारे शरीर और नक्षत्रोंमें कालपुरुषका जहर छिपा हुवा है । जिसको सत्यगुरु दया करके अपनी ओर खींचे वह आवे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य, जो कि यमके नीचेसे निकल सके । धर्मरायके मन्त्रने समस्त मनुष्योंकी बुद्धिको अन्धी कर रक्खा है । किसीको इस विषयका सोच नहीं कि, मैं जानबूझकर क्यों कुएँमें पडता हूँ । मेरे पुरुषा तो सब इस धोखेमें पडकर मरे, मैं इस अंधकारमय पथपर क्यों चलूँ । इनकी बुद्धि डुबकियों खारही है । इसीसे सत्यको मिथ्या तथा मिथ्याको सत्य मान रही हैं । छुटकारेको बंधन तथा बंधनको छुटकारा समझ रही है, इनकी बुद्धि तथा चित्त ठिकाने नहीं है । इनकी पाशविक बुद्धिमें मनुष्यता लेश मात्रभी नहीं है ।

काम शास्त्र और चार पुस्तकें ये सब कालपुरुषके जाल हैं, उसने इस जाल में फँसाकर सारे मनुष्योंको मार लिया है, उन्हें ऐसा धोखा दिया है कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रगट किये । सत्यपुरुषके धोखेमें सब मनुष्य कालपुरुषकी वंदना करने लगे, कालपुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया, यहांतक कि, यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा, इस धोखेसे सारे मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गए । जो कोई काम शास्त्र तथा चार पुस्तकोंसे पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदके ज्ञानकी प्राप्ति होगी । जिनका प्रेम पुरुष वेदसे है, वे सूक्ष्म वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं ?

विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है । उसीके अधीन सब हैं, निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु येही समस्त लोकोंके रचयिता एवं कर्ता धर्ता हैं, विष्णु तीनों लोकोंमें सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं । दोनों रूपसे निरञ्जन तीनों लोककी ठकुराई करता है ।

तीनों लोकों और भवसागरका ठेकादार निरञ्जन है । सहस्र असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठेका है । इतने समयतक तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा । जब ठीकाकी सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा । इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकारेकी आशा होगी ।

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