कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमूर्तियों हैं, सब मेरे सत्यगुरुकी हैं । सब जीवोंमें गुरुकी कान्ति जाने तो वो मुक्ति का अधिकारी है ।
मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं यही नहीं किन्तु, सत्यगुरुसे सहायता माँगता रहे कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करे । भले कार्योंमें सदैव उद्योग करता रहे ।
मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ मेरा परमेश्वर क्या है । इस कारण सत्यगुरु पर पूर्णतया निर्भर रहे कि, वह जब मुझको दृष्टिप्रदान करेगा, तब मैं जानूँगा ।
कालपुरुषके जितने धर्म, पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ एवं सबका सरदार है । यह सतोगुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढी है । सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।
सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करे । जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास होगया उसीका बेडा पार होगया समझो ।
सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जान लिया उसका बंधन टूट गया, वो कालके पञ्जेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका सार है, परन्तु अपनी कमाईका दशवाँ भाग गुरुका हक है बुद्धिमान् पुरुष मुक्तिका भागी होता है ।
जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य हो, उसीमें बुद्धि होती है । निर्बुद्धि सुन्दर मनुष्यभी पशु हैं । उनमें बुद्धि नहीं होती ।
पारख गुरु प्रत्येक स्थानपर उपस्थित है । परन्तु जबतक उसके पथमें अपने को मैं न्योछावर न करूँ तबतक उसका दर्शन न हो सकेगा ।
सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं । जो कोई सत्य प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।
ये तीनों लोक विषवृक्षके ही फल हैं । प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक खान, तथा प्रत्येक मकानमें विष भरा हुवा है । विना सत्यगुरुकी भक्तिके वह नसोंसे बाहिर नहीं होता ! न किसी अन्य युक्तिसे वो पृथक् हो सकता है ।
जान बूझकर विष खाना मनुष्यता नहीं है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करे और दूसरोंसे करावे और करते हुआओंको देखकर प्रसन्न हो यही वंदना है ।
प्रत्येक मनुष्य विना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता हुआ द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वही है जो कि, द्वेष रहित होकर वह धर्म ढूँढ़े, जिससे कि, उसके आवागमनका मार्ग एक बारगीही बंद होजाय ।