भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 358

तीरथ कोटि अनन्त है रे गङ्ग यमुन जहाँ दुई ॥
मध्य सरस्वती बहत है रे नहाय निर्मल होवे ।
ब्रह्म अगिनके घाटमें रे आगे शिवके लिङ्ग ॥
ताहूँपे दछिना दीजिए रे बहुत सहसमुख गङ्ग ।
आगे कलालीकी हाट हरे चोखा फूल चुनन्त ॥
विन सद्गुरु पावे नहीं रे कोई साधू जन पीवन्त ।
शीश उतार धरणी धरे रे ऊपर धरले पाए ॥
ब्रह्म अगिनके घाटपे रे इस विधिपर वेनहाए ।
ऋग् यजुर साम अर्थवनां रे चारों वेदका ज्ञान ॥
उनके वहाँ कहो कौन गति रे बाँधे गॉठ अघान ।
चारों वेदको पिता हैं रे सूक्ष्म वेद सङ्गीत ॥
साहब कवीर जूक मुकद्दमे रे अविर्त ब्रह्म अतीत ।

यथा—पण्डित सतपद भजो रे भाई जाते आवागमन नशाई ॥
ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहि चीना आप कहाँते आए ॥
एक योनिसे चार वरन भए ब्रह्मदेव कहाँ पाए ॥
बारह वेदी ब्रह्म बखानूँ स्वर ओ शक्ति समानी ।
संध्या तर्पन तहाँ करलीना जहाँ कुशा नहि पानी ॥
ऋग् यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवन सोई ।
सूक्ष्म वेदको भेद न जाने क्योकर ब्रह्मन् होई ॥
शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं ।
लख चौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥
नौगुण सूत सँयोग बखानूँ निरगुण गॉठ दयानी ।
तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह बानी ॥
कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत् जनेऊ सोई ।
पाखैंडकी गति सबहि मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥

यथा—हिरवा गँवाए सास चलीं वारी धनियां ।
कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियाँ ॥
कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियाँ ।
एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियाँ ॥
सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियाँ ।

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 358, कुल 1367 में से · BharatKosha