भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मतवाले हो गये । इस पराभक्तिरूपा प्रेम मदिराका नशा यहाँतक बड़ा कि, गोपियोंकी पी हुई प्रेममदिराके वश हो संगुण ब्रह्म भगवान् कृष्ण दीवानी गोपियोंके पीछे आप भी दीवाने बन कर छः मासकी रात की । उसका नशा अब भी नहीं गया है । वृन्दावनकी रास कुंजमें अब भी गोपियोंके साथ नाचना पड़ता है तथा वहाँ सामगानके साथ अपने स्वरूपको याद करते कराते रहते हैं । सुर नर मुनि पीर और ओलिया जिन्होंने पिया है उनको पता है क्योंकि, वो आनन्द-वाणीसे तो कहाही नहीं जाता । इसी कारण कबीरदासजी कहते हैं कि, गूंगा यदि सक्कर खाले तो वो उसका स्वाद कैसे बता सकता है कि, ऐसा स्वाद है । इन इन्द्रियोंमें वो बल नहीं जो उस आनन्दका अनुभव भी बखान कर सकें । ये हैं कबीर साहिबके अक्षर कि, वे गोरखनाथ, दत्तात्रेय, वशिष्ठ, व्यासदेव, शुक्राचार्य, नारद, शुक्रदेव, शिव, सनकादिक, अम्बरीष, याज्ञवल्क्य, जनक, जड़भरत, शेष, ध्रुव, प्रह्लाद, विभीषण, पार्वती और गोपियाँ ये सब सब सच्चिदानन्द सत्य पुरुषके परम भक्त हुए हैं । यहाँतक कि, कबीर साहिब भी इनका प्रेमके साथ स्मरण करते हैं इन्हें उस स्वादका लेनेवाला बताते हैं जो कि, वाणीसे न कहा जा सके । कबीरके प्रकाशमें ये भी स्मार्य रूपसे आगये हैं अतः इनकी भक्तिसे सनी जीवनीकाही उल्लेख होना चाहिये जैसी कि, इनमें कबीर साहिबकी श्रद्धा है ।

वसिष्ठजी ।

जिनका स्मरण कबीर साहिबने श्रद्धाके साथ किया है उनमें वसिष्ठजी भी आ गये हैं । आपने परा भक्तिरूप प्रेममदिरामें मस्त होकर ही केवल रामके दर्शनोंके लिये ही पौरोंहित्य स्वीकार किया था । आपका लिखा योगवासिष्ठ, मुक्तिपथका अपूर्व प्रदर्शक है । जीवनमुक्तिकी शिक्षा देनेके लिये तो वो सूर्यसे भी बढ़कर है । इनमें नामकी उपासनामें भी वो बल है कि, भगवान् राम उसके अहंग्रहके उपासकको भी अपना गुरु मानने लग जाते हैं । अभी कुछ दिन हुए अयोध्याके वसिष्ठजीके चरणामृतके मिले बिना सत्य पुरुष रोने लग जाया करते थे । जिस दिन तकलीफ होती थी तो सीताजी भी आकर कहती थीं कि, बाबा ! आज मेरा कलेवा नहीं रखा गया, यह है वसिष्ठजीका माहात्म्य । आज इस कराल कलिकालमें भी अपने को वसिष्ठ माननेवालोंको सीताजी बाबा कहके अभिवादन करती हैं । इनकी अनेकों कथाएँ पुराणोंमें लिखी हुई हैं । यदि समन्वयके साथ विचारी जायें तो आनन्दका सामान मिलेगा किन्तु जिसकी आखोंमें बही छाई हुई हैं उनका तो कहनाही क्या है ?