भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कहलावे ? जितनी पूजा पाठ योग मुक्ति आदि हैं, सब इस विराटपुरुषही द्वारा उत्पन्न हुई हैं। सो सब खिलाड़ीका खेल है, सब लोग इस खिलाड़ीके खेलमें लग रहे हैं, खिलाड़ी को पहचान नहीं सकते कि, यह कौन है जो समस्त संसारको नचा रहा है ? जिसने इस खिलाड़ीको पहचान लिया, उसके खेलके भेदको जान लिया, फिर जादूगरका जादू और मंत्रादि इसपर फलित नहीं होता। उस जादूगर का जादू तबहीतक फलीभूत होता है जबतक यह भेदको नहीं जानता है। उसके जाननेकी बही रीति है जो वेदने बताई है।

जितने वेदपाठी हैं वे वेदके अर्थको अपनी अपनी बुद्ध्यानुसार करते हैं। कितने मनुष्योंने मिथ्याको सत्य प्रमाणित करनेका उद्योग भी किया है तथा अर्ब भी करते हैं। तो भी मिथ्या सत्यसे श्रेष्ठ माना नहीं जा सकता। जब हंसोंके सामने आवेगा तब दूधका दूध और पानीका पानी पृथक् होजावेगा। जो कोई अग्निको जल जानकर उससे नहावेगा तो वह निश्चय भस्म होजावेगा, वह अग्नि तो अपना स्वभाव कदापि नहीं छोड़ेगी। जो कोई विषको अमृतफल जानकर खावेगा वह निश्चय मर जावेगा, इसी प्रकार जो कोई अपने सुकर्मोंपरही भरोसा रखे सत्य-गुरुके करग्रहणके निमित्त उत्सुक न हो, उनको न मिले तो वह इस अंधकारमय समुद्रके पार कदापि न हो सकेगा, पर जब अच्छे कर्मोंका फल यहाँ तक उदय होगा कि, पारखी गुरु मिल जायगा तो सब बन्धनोंसे छूटकर सत्यलोक चला जायेगा।

इस विराटपुरुषके एक हाथमें वेद है और दूसरे हाथमें राजदंड है और तीन लोकके समस्त जीवोंका राजा है। सबको अधीन कर रहा है, इसकी अधीनतासे कभी कदाचित् कोई बाहर जा सकता है। जिसपर कबीर साहबकी परम दया होती है उसको वह स्वयम् कालपुरुषके पञ्जेसे छुड़ाता है। मनुष्योंमें से ऐसा कोई नहीं है कि, अपनी पूजा पाठ तथा तपस्यासे सत्यपथ पावे। कारण यह हैं। कि, जब बड़ों बड़ोंको पथ नहीं मिला तो वे दूसरेको क्या दिखलावेंगे ? इसी कारण प्रायः ऋषि मुनि जन्मबंधुवे हुए। इन सबकी बुद्धिको कालपुरुषने विलोपित कर दिया है कुछ सूक्ष्मता नहीं है, कोई बूझता नहीं सब जिह्वाओं पर इसकी मुहर लग गई है। इस कारण वे लोग देखते हैं पर देखते नहीं। सुनते हैं पर सुनते नहीं। बोलते हैं पर बोलते नहीं। प्रत्यक्ष दुष्कर्मोंको देखते जाते हैं उसीका अनुसरण करते जाते हैं। फिर इनको मनुष्य कहना चाहिये अथवा मनुष्यतासे पृथक् ? वास्तवमें मनुष्य वह है जो बुराईको देखे और उससे तुरंत भाग जावे फिर उस पथपर कभी पैर न रखे ॥