कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबलिप्रदान ।
बलिप्रदानके विषयमें समस्त बातोंका मिलान करके देखलो । सबमें मिलान ठहरेगा । बलिप्रदान सत्य तथा ठीक अवश्य है । कारण यह कि, इस विराट् पुरुषका भोजन है । अग्नि उसका मुख है । जो हृव्य वस्तुएँ वेदमंत्रोंको पढ कर या इसपुरुषका ध्यान करके अग्निमें डाली जाती हैं सो सब उसका भोजन है । वह उसको खाता है । इसी विराट् पुरुषके निमित्त बलिदान करना आवश्यक है । उत्पत्तिकालके आरम्भसे लेकर अबलें वही काम नियमानुसार होता चला आता है । इस महापुरुषके निमित्त बलिप्रदान नियत किये गये । इसी प्रकार महामाया की सभामें प्रत्यक्ष गला काटा जाता है । कोट कांगडा और कामरू कामक्षा आदि सहस्त्रों स्थानोंमें गले काटे जाते हैं । ये पांचों बटुक आदि भयानक तथा मनुष्यों को त्रास देनेवाले हैं । इन्हींकी पूजा वाममार्गके पुस्तकोंमें है । जो लोग उनकी पूजा कर उसे तो बलि करना आवश्यक है । बिना बलिके यह विराट्पुरुष प्रसन्न न होगा । भला जी ! यदि खेती करने वाला राजा अथवा पदाधिकारीको भूमि कर न दे तो खेतीका काम उससे निश्चय छीन लिया जावेगा । भला जी ! समस्त संसार तो उसकी प्रजा है । सबका सब सके हाथोंके नीचे हैं । फिर कैसे बलि न करें ? निदान यह बलि तथा बैसाही अग्नि पूजन प्राचीन कालसे चला आता है । वाममार्गी पंडित और मुल्ला क्राजी इत्यादि इस बलिप्रदान करनेके अगुवा तथा पथदर्शक हैं । इन बलिप्रदानोंके पापोंने सब जीवोंको आवागमनके बन्धनमें फँसा रक्खा है । इसी निर्दयता और प्राणघातके कार्यने समस्त मनुष्योंको निर्दयी बना दिया है । जो कोई वाममार्गी पश्चिमकी पुस्तकोंके अनुसार चलेगा, वह अवश्य बलिप्रदान करेगा । चारोंमें बराबर बलिकी आज्ञा है उन पुस्तकोंके मानने वाले सदैवसे करते आए हैं, पर वेद उनके विरुद्ध है । उसका तो सिद्धांत है कि, अस्तित्व नु तस्मादोजीयो यद्भि हव्येन ईजिरे यानी उस सत्य पुरुषका ध्यान ही सबसे बड़ा है ।
यज्ञ शब्दार्थ ।
देवपूजा, संगतिकरण और दान इन अर्थोंवाले यज्ञ धातुसे नङ् प्रत्यय होकर 'यज्ञ' शब्द बनता है । कोशकार हैमने इसका आत्मा, मख, नारायण और हुताश (अग्नि) अर्थ माना है । इसके विवरण कल्पसूत्र और श्रौतसूत्रोंमें भरा पड़ा है । पहिले पुरुष मखोंसे ही सत्यपुरुषको प्रसन्न करते हुए उसके पुण्यसे पापों को नष्ट किया करते थे । विराट् पुरुषको भी इसीसे तृप्त किया करते थे । आज