कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंको संक्षेपसे लिखकर दर्पण बना दिया है, जिसमें प्रत्येक मनुष्य अपना मुँह देखलें कि, वेदने सृष्टिका कितना हित किया है।
मृगमेध ।
इमंमाहि५. सीरेकशफम्पशुद्धूर्निक्दंब्वाजिनं वाजिनेष ॥ गौरमारण्य मनुते दिशामि तेनचिन्वानस्तन्वो निषीद ॥ गौरन्तेशुगूच्छतु यन्दिष्मस्तते- शुगूच्छतु ॥ यजुर्वेद अध्याय १३ मंत्र ॥ ४८ ॥ हे अग्ने ! इस अत्यन्त हींसनेवाले वेगवालोंमें वेगवाले एक खुरवाले घोड़े पशुको मत पीड़ा देना, तुम्हारे निमित्त बनके गौरवर्ण मृग देता हूँ, उनसे खेल शरीर पुष्ट करते हुए तुम यहाँ स्थित रहो तुम्हारा प्रेम अश्वकी समान गौरमृगको प्राप्त हो एवं जिससे हम द्वेष करें उसको तुम्हारा संताप प्राप्त हो ॥ यदावधन्दाक्षायणा हिरण्यॐशतानीकाय सुमनस्यमाना : ॥ तन्मऽआवधनामि शतं शारदायायु- ष्माञ्जरदष्टिर्यथासम् ॥ य० अ० ३४ मंत्र ५२ ॥ सुंदर मनवाले दशवंशो- त्पन्न ब्राह्मण जिस सुवर्णको बहुतसेनावाले राजाके निमित्त बाँधते हुए उस सुवर्णको सौ वर्ष जीवनके निमित्त अपने शरीरमें बाँधता हूँ जिस प्रकार मैं दीर्घजीवी वृद्ध अवस्थातक होऊं ॥
अजमेध ।
शक्रन्त्वा शुक्लेण क्रीणामि चन्द्र चन्द्रेणामृतममभूतेन ॥ सग्मेते गोर- स्मेते चन्द्राणितपसनूरसि प्रजापतेर्वर्णः परमेण पशुनाक्रीयते सहस्रपोषम्पुषेयम् ॥ य० अ० ४ मंत्र ३६ ॥ हे सोम ! तुम आह्लाद करनेवाले स्वादुमें अमृतकी समान दीप्तिमान् हो तुमको दीप्तिमान् विनाशरहित आह्लादकारक सुवर्णसे क्रय करता हूँ । हे सोमके बेचनेवाले ! सोमके मूल्यमें जो गौ तुमको दी थी वह तेरी गौ फिर लौटकर यजमानके घरमें स्थित हो सुवर्ण तेरा हो न कि गौ । हे सोमविक्रेता ! तुमको जो सुवर्ण दिये हैं वे हमारे पास आकर स्थित हों तुम्हारी गौही मूल्य हो तुम्हारे प्रसादसे पुत्र पशु आदि सहस्रोंकी पुष्टि जिस प्रकार हो तैसे मैं पुष्ट होऊं वा पुष्ट करनेमें समर्थ होऊं पहिले आर्य द्वेष रहित थे वो जड़ चेतन सबके भीतर सत्य पुरुषको मानकर पूजा किया करते थे । पशुओंके प्रतिभी उनका ऐसा भाव था तो फिर मनुष्योंसे वैर तो करही नहीं सकते थे तब उनमें तो बलिदान प्रवेशही नहीं कर सकता था ॥
बलिप्रदानकी रीति ।
आदमके पुत्र काबील और हाबीलने बलिदान किया । तदुपरान्त अन्यान्य