भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानी अंश हैं । पृथ्वीपर मनुष्योंको मुक्ति देनेके निमित्त गया था । अब सात लाख हँसोंको लेकर सत्यलोक चला हूँ । इस बातपर जलरङ्गजीके मनमें कुछ अहङ्कार आया कि मैं सत्यपुरुषका अंश हूँ बिना मेरी आज्ञाके कबीर साहब पृथ्वीपर कैसे गए तथा पृथ्वीके हँसोंको लेकर चले हैं । कबीर साहबसे कहा कि सत्यपुरुषकी आज्ञाके विरुद्ध आपने ऐसा कार्य क्यों किया ? ऐसा घमंड कबीर साहबने जलरङ्गजीके मनमें देखा जान लिया कि इसने मुझको नहीं पहचाना इस कारणही ऐसा कहता है । समस्त कौतुक वह सत्यगुरु आपही करता है । इस कारण जलरङ्गजीका घमंड तोड़नेके निमित्त उन्होंने कुष्ठम पक्षीका प्रसंग छेड़कर कहा कि मैं कुष्ठम नामक एक पक्षीके पास गया था वह सत्यगुरुका हंस है पक्षीकी सूरतमें है । वह मुझसे अनगिनती युगों सैकड़ोंही उत्पत्ति स्थिति और विनाशकी कथाएँ कहने लगा । वह पक्षी बड़ाही तेजोमय है । जब कुष्ठ-मजीके इस विवरणको सुनकर जलरङ्गजीके मनमें दर्शनकी बड़ी उमङ्ग उत्पन्न हुई । कबीर साहबसे कहा कि अब आप मुझको उनका दर्शन कराओ आपने आज्ञा दी कि विमान प्रस्तुत कराओ । उसी समय विमान प्रस्तुत हुए । जलरङ्गजी समस्त हँसोंको लिए कुष्ठम ऋषिके दर्शनको चले एक पलमें कुष्ठम-ऋषिके आश्रम निरन्तर द्वीपमें जा पहुँचे वहाँ पहुँचर देखा तो कुष्ठम ऋषिके द्वारपर दो द्वारपाल खड़े थे उन्होंने भीतर जाकर पक्षीको समाचार दिया । पक्षीकी समाधि लग रही थी । कबीर साहबने अपने शब्दसे पक्षीकी समाधि खोलदी । द्वारपालोंने कहा कि महाराज ज्ञानीजी और जलरङ्गजी करोड़ों हँसोंसहित आपके द्वार पर दर्शनार्थ खड़े हैं । जलरङ्ग तथा ज्ञानीको भीतर आनेकी आज्ञा दी दूसरे किसीको नहीं दी । ज्ञानी और जलरङ्गजी भीतर गए । जलरङ्गने देखा तो उस पक्षीका ऐसा तेज था कि मानों करोड़ों सूर्य तथा चन्द्र उसके प्रकाशके सामने तुच्छ हैं । बड़ा प्रकाशित तथा तेजस्वी मुख देखकर जलरङ्गने स्तुति करके पूछा कि आप पक्षीस्वरूप क्यों हो ? तब कुष्ठमने कहा कि मैं कबीर साहबका चेला हूँ उनकी आज्ञाका उल्लंघन किया इस कारण मेरा स्वरूप इस प्रकारका हो गया । यह बात सुनतेही जलरङ्गजीका घमंड पृथक् हो गया । जान लिया कि कबीर साहब स्वयम् सत्य पुरुष हैं इसमें तनिक भी संदेह नहीं । जलरङ्गजी कबीर साहबकी बंदना स्तुति करते हुए अपनी बुद्धि पश्चात्ताम करके सत्यगुरुके सेवक बनगये । यह इस उद्धृत प्रकरणका तात्पर्य है ।