कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 555, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसगुणहु नाम अनन्त बतावत । निर्गुण नाम रहत घर पावत ॥
सरगुण नाम सकल संसारा । निर्गुण है एक नाम हमारा ॥
सरगुण नाम सकल भरमावै । निर्गुण नाम हंस घर आवै ॥
सरगुण निरगुन रहे अकेला । ताके संग गुरु नहि चेला ॥
मारग झीन सुनो मुनि ज्ञानी । लगवत मकर तार जो तानी ॥
गुप्त मुनीको चौका कीना । लखिके पान तुरत तेहि दीना ॥
युगनन्दीकी अवधि बखानो । एक करोड़ बरस परमानो ॥
मानुष अवधि सहस रह तीना । तहाँ गुप्त मुनि भये अधीना ॥
सद्गुरु मुनिवर लै चले डोरी । टूट घाट अठासि करोरी ॥
देखत मुनि हंसन युथ आवा । सकल साज मंगल भल गावा, ॥
अनहद बाजन बाजे लागा । मंगल भौति भौति उठ रागा ॥
हंस परछ संग गहिलीना । धन्य हंस सद्गुरु भल चीना ॥
विषय वास छाडे भल हेता । पद परताप काल तुम जीता ॥
तात्पर्य —यह मुनि बड़ा तपस्वी था करोड़ों वर्षपर्यन्त एक स्थानपर तप किया । कबीर साहबने उनको लोकको पहुँचाया जिस समय नन्दीयुगकी स्थिति एक करोड़ वर्षकी थी, उस समय मनुष्योंकी आयु तीन सहस्र वर्षकी होती थी, जैसे गुप्त मुनिको पहले सत्यगुरुने अंतरिक्षकी सैर करवाई फिर परमधामको भेज दिया । ऐसेही अनेकों लोगोंको लोक दिखलाकर पलटा लाये प्रारब्ध भोगके पीछे लोक ले गये ।
दत्तात्रेय और कबीर ।
आठवी अध्यायमें कह दिया है कि, दत्तात्रेय भी पराभविरूपा प्रेम-मदिराके दीवाने थे उनकी उत्पत्ति भी कही है जैसी कि, भागवतने कही है तथा जैसा कि, कबीर सागर १० आगम निगमबोधमें लिखी हुई है वहाँ केवल उतना ही अन्तर हुआ है कि, गुरुओंकी जगह २४ चेला कह दिये हैं । अब कबीर साहिब और उनकी सत्संगचर्याको लिखते हैं—
देवदत्त वचन—स्वामी ! मन, पवन शब्द नाद, ब्रह्म, हंस, शिव, शून्य और काल कौन है ?
अविनाशी वचन मन चञ्चल पवन निराकार, शब्द नाद, अनहद ब्रह्म, हंस और अकेला है ।
देवदत्त वचन—कहाँ बसे मन, कहाँ बसे पवन, कहाँ बसे शब्द, कहाँ बसे