भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करता है। भुशुण्ड ऋषिको कागभुशुण्ड भी कहते हैं, यह कागभुशुण्ड चिरंजीव हैं। कोई कोई ऋषिगण जो आपके स्थानको जानते हैं वे पक्का दर्शन करते हैं। आप हंस कबीर हैं स्वसंवेदधर्मका उपदेश करते हैं। कबीर साहबने आपको सम्पूर्ण शब्द प्रदान किया जहाँ चाहें वहाँ रहें, उनकी इच्छा है। वशिष्ठ पुराणमें उनकी उत्पत्ति शिवजीद्वारा लिखी है। सो न मालूम किस सृष्टिमें आप शिवजीद्वारा उत्पन्न हुए थे। कितनी उत्पत्ति स्थित तथा विनाश देखते रहते हैं। जबसे कबीर साहबका चिह्न लगा तबसे अजर और अमर हो गये। भुशुण्ड ऋषिके समान अनगिनती हंस कबीर हैं। ये समय समय पर संसारमें विचरा करते हैं।

कबीर और राजा जनक।

राजा जनक एक सुप्रख्यात ज्ञानी थे, कितने ऋषि मुनिगण आपके दरबारमें रहा करते थे, सदैव धर्म और ज्ञानकी चर्चा हुआ करती थी। आप विदेह कहलाते थे, उनको कबीर साहबका उपदेश मिला जिससे वे अपनी भूलको छोड़ करके हंस कबीर हो गये। यह राजा जनक त्रेतायुगमें हुए, आप धर्म तथा ज्ञानके बड़े दृढ़नेवाले थे, सत्यगुरुके मिलनेसे आपकी खोज पूरी होगई। तभीसे जनकपुरीकी गद्दीपर बैठनेवाले सब राजा विदेह कहलाने लगे। ज्ञानियोंमें जनकजीका मुख्य स्थान है।

बङ्ग-देशके राजा।

अम्बुसागरके सप्तम तरंगमें तारन युगकी कथा आयी है, कबीर साहबने धर्मदासजीको सुनाई है, उस कथाका प्रारंभ—

चौ०—सुकृत सुनो आदिकी वानी। सत्य पुरुष बैठे और ज्ञानी ॥

तारन युग परवाना आनी। चार लाख युग अवधि बखानी ॥

उत्तर पंथ रहे एक राई। धर्मदास तेहि कथा सुनाई ॥

यहाँसे किया है। कबीर साहब धर्मदाससे कहते हैं कि, उत्तरकी ओर एक राजा रहता था, वह राजा बड़ा अत्याचारी था। साधु योगी इत्यादिको पकड़कर कैद किया करता था। ब्राह्मण बैरागी आदिको देखकर जल मरता था। यदि ब्राह्मण आदिके मस्तकपर तिलक देखे तो उस तिलकपर खपड़ी धसवाता था। ब्राह्मणको सोंटा मार जनेऊको तोड़कर आगमें डाल देता था। उसके समयमें न कोई वेद पुराण पढ़ सकता था न भक्ति कर सकता था। न कोई परमेश्वरका नाम ही लेने पाता था। जङ्गली पशु, हिरन आदि घास न चरने पाते, सबको मारकर खा जाता था। अनगिनती पशुओंको मारता, बड़ा दुःख देता। कबीर साहबका कथन है कि, उसकी दशाको देखकर हम वहाँ गये।