कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृष्ण वचन ।
चौ०— सुनके कृष्ण उत्तर तब दीन्हा । भले गरुड़ तुम उनको चीन्हा ॥
सरगुण कई बार अवतारा । निज साहब है अगम अपारा ॥
सो साहब हमको निरमाया । आज्ञा कीन्हीं हमहिं उपाया ॥
जो कबीर भाषे अरथाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥
गरुड़ वचन ।
गरुड़ कहे तुम काहे न भाखी । कैसे मोहिं छिपायके राखी ॥
सरगुण प्रभु दीन्हा फैलाई । निरगुन कैसे नहिं प्रगटाई ॥
कृष्ण वचन ।
सुनहु गरुड़ एक वचन प्रमाना । निरगुन कोई बिरलै जाना ॥
हम देही धरि क्रीडा कीन्हा । यही मान सब काहू लीन्हा ॥
हम गीतामहैं सन्धि जनाई । ताको कोई न चीन्है भाई ॥
निरगुन भेद कहूँ परमाना । मनकर भेद न कोई जाना ॥
पढ़ गीता पण्डित बौराई । अर्थ भेद को गम नहिं पाई ॥
पढ़ गीता औरन समझावें । आप भरममें जन्म गवावें ॥
कथ गीता हम सकल बताई । पण्डित अर्थ न समझा जाई ॥
ब्रह्मा विष्णू शिव कह भाई । इन तीनों मिल बाजी लाई ॥
ता बाजी अटका सब कोई । निरगुणकी गम कैसे होई ॥
बाजी लायके जग भरमाई । निर्गुणकी गति कोइ नहिं पाई ॥
मैं सब जानूँ भेद अवगाहा । और देव नहिं पावैं थाहा ॥
गीताको हम कथ समझाई । सा अर्जुन नहिं मानी भाई ॥
रहन गहन उनहैं नहिं पाई । अरथ सुनै सब जन अरुझाई ॥
पण्डित पढ़ गीता अरथावै । गीता केर अर्थ नहिं पावै ॥
फिर फिर हमहींको ठहरावै । निर्गुणकी गम नाहीं पावै ॥
हम कबीरको नीके जाना । उनहीं कीन्ह सकल मण्डाना ॥
सकल जीव उन अण्ड मुँदाई । इनहीं सबहीं अर्थ दूढ़ाई ॥
जहैं लगि तीरथ देखहु जाई । इनहीं सब थापना थपाई ॥
और सकलको रचना कीन्हा । यहि विधि थाप सबनको दीन्हा ॥
हम तीनों पुरुष बिसराई । आप आपको कीन्ह बड़ाई ॥
साखी—कह कृष्णजी गरुड़से, तुम गुरु करो कबीर ॥
हंस लोक पहुँचावई, खेड़ लगावै तीर ॥