कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 592, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकैसे छोड़िहो हाथी घोड़ा । कैसे छोड़िहौ ग्रन्थ मँडारा ॥
कैसे छोड़िहौ काम तरङ्गा । कैसे राजसे करो मन मङ्गा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बाँधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजो अन्तरकी वासा । तवही चलो हमारे साथा ॥
राजा वचन ।
राजा कहें दोउ करजोरी । सुनिये समरथ विनती मोरी ॥
नगरके सब षट् वरन बुलाई । तेहि अवसर सब माल लुटाई ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेउ वासा । मैं तो देहकी छाडी आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरवानी ॥
नगर कोट की छोड़ी आसा । निस दिन रहूँ तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊँ । करो दया मैं शीश नवाऊँ ॥
उमँग उठे हर्षित मग मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकासा । तबसे पूजी मनकी आसा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोडूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढ़ाऊँ ॥
सत्यगुरु वचन ।
तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति काहो बिस्तारा ॥
चार गुरुको चौका कराओ । तिनका तोरायके जल अरपायो ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भावभक्ति हम चाहैं राजा । धन सम्पत्तिसे नहिं कछु काजा ॥
तब राजाने कबीर साहबकी आज्ञानुसार समस्त सामग्री मँगा अत्यंत नम्रताके साथ विनय करने लगा कि, हे सत्यगुरु ! मैं आपकी शरणमें हूँ । मुझको यम फाँसीसे बचाओ । हे मेरे सत्यगुरु ! मैं महापापिष्ठ हूँ आपने मुझसा पापी भी कभी तारा है या नहीं ? ।
सत्यगुरु वचन ।
चौ० —तब सद्गुरु बहुतै बिहँसाना । फिर राजासे निर्णय ठाना ॥
सत्ययुगमें सत सुकृत नाऊँ । जाय सोरठमें धारचों पाऊँ ॥
खेमश्री ग्वालनहि उबारी । बह्तर जीव ले लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुषके पाँही । और हंस द्वीप रहौँही ॥
त्रेता मांहि मूनीन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारचों पाऊँ ॥