कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 616, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजावीरसिंह वचन ।
चौ० – राजा ! नामदेव कह वानी । अगम ज्ञान वह करत वखानी ॥
नामदेव वचन ।
जो नर निर्गुण नामहिं ध्यावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥
राजा छरीदास पठवाई । जाय कबीर कहँ आनि बुलाई ॥
राजा वीरसिंह वचन ।
जो कोइ निर्गुण नाम सुनावे । परम प्रेम हमरे उर आवे ॥
अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावैं हरिहर ताको ॥
अहिपति अस्तुति करत हैं जाही । सुरपति निशि दिन गावैं ताही ॥
साखी – राजा छरीदार कह, आनु कबीर बुलाय ।
वचन एक हम पूँछि हैं, कहैं उन सुरति लगाय ॥
चौ० – छरीदार तुरतहि चलि जाई । बैठे जहाँ कबीर रहाई ॥
छरीदार तब बिनती लाये । अहो कबीरजी राय बुलाये ॥
बिनती राय करे कर जोरी । लाओ कबीर वेग तेहि ठौरी ॥
सतगुरु वचन ।
कहैं कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राम बुलाई ॥
ना मैं पाठी ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥
ना मैं परजा देश बसाऊँ । ना मैं नाटक चेटक लाऊँ ॥
पैसा दमडी नाहिं हमारे । केहि कारण मोहि राम हँकारे ॥
साखी – छरीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥
महा प्रचण्ड बघेल हैं, हम नहिं मानैं त्रास ॥
जब नामदेवजीने कह दिया कि, वो सिवा रामके दूसरे देवको नहीं मानता । राजाने छरीदारके हाथोंसे बुलाया पर जब कबीर साहब छरीदासके कहनेपर नहीं गये तो वह क्रोधित हो राजाके पास जाकर कहने लगा कि, महाराज ? कबीर बड़ा अहंकारी है, मेरे बुलानेसे वह नहीं आता सर्कारको तूण समान भी नहीं समझता । इतनी बात सुनकर राजा अपने मनमें विचार करने लगा, इतनेहीमें नामदेवजी बोले कि, वह जुलाहा यहां नहीं आवेगा. वह बड़ा घमण्डी और अहंकारी है । राजाने अपने मनमें निश्चय कर लिया कि, वह सत्यभक्ती करते हैं । उनको मेरा क्या भय है ? इसलिये मैं ही उनके पास चलूँ तो अच्छा होगा । राजाने सवारी मँगा बहुतसे मुसाहिबोंको साथ लेकर कबीर साहबके पास गया वहां जाकर क्या देखता है कि, कबीर साहब माला, टोपी, तिलक, कूबरी आदिसे