भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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राजावीरसिंह वचन ।

चौ० – राजा ! नामदेव कह वानी । अगम ज्ञान वह करत वखानी ॥

नामदेव वचन ।

जो नर निर्गुण नामहिं ध्यावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥

राजा छरीदास पठवाई । जाय कबीर कहँ आनि बुलाई ॥

राजा वीरसिंह वचन ।

जो कोइ निर्गुण नाम सुनावे । परम प्रेम हमरे उर आवे ॥

अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावैं हरिहर ताको ॥

अहिपति अस्तुति करत हैं जाही । सुरपति निशि दिन गावैं ताही ॥

साखी – राजा छरीदार कह, आनु कबीर बुलाय ।

वचन एक हम पूँछि हैं, कहैं उन सुरति लगाय ॥

चौ० – छरीदार तुरतहि चलि जाई । बैठे जहाँ कबीर रहाई ॥

छरीदार तब बिनती लाये । अहो कबीरजी राय बुलाये ॥

बिनती राय करे कर जोरी । लाओ कबीर वेग तेहि ठौरी ॥

सतगुरु वचन ।

कहैं कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राम बुलाई ॥

ना मैं पाठी ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥

ना मैं परजा देश बसाऊँ । ना मैं नाटक चेटक लाऊँ ॥

पैसा दमडी नाहिं हमारे । केहि कारण मोहि राम हँकारे ॥

साखी – छरीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥

महा प्रचण्ड बघेल हैं, हम नहिं मानैं त्रास ॥

जब नामदेवजीने कह दिया कि, वो सिवा रामके दूसरे देवको नहीं मानता । राजाने छरीदारके हाथोंसे बुलाया पर जब कबीर साहब छरीदासके कहनेपर नहीं गये तो वह क्रोधित हो राजाके पास जाकर कहने लगा कि, महाराज ? कबीर बड़ा अहंकारी है, मेरे बुलानेसे वह नहीं आता सर्कारको तूण समान भी नहीं समझता । इतनी बात सुनकर राजा अपने मनमें विचार करने लगा, इतनेहीमें नामदेवजी बोले कि, वह जुलाहा यहां नहीं आवेगा. वह बड़ा घमण्डी और अहंकारी है । राजाने अपने मनमें निश्चय कर लिया कि, वह सत्यभक्ती करते हैं । उनको मेरा क्या भय है ? इसलिये मैं ही उनके पास चलूँ तो अच्छा होगा । राजाने सवारी मँगा बहुतसे मुसाहिबोंको साथ लेकर कबीर साहबके पास गया वहां जाकर क्या देखता है कि, कबीर साहब माला, टोपी, तिलक, कूबरी आदिसे