भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मुंहमें डाल दीजिये । बूढ़े बाबाने पानकी पीक दादूरामके मुंहमें डाल दी । उस समय दादूरामका हृदय स्वच्छ तथा प्रकाशित हो गया ; कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । जब पहले कबीर साहब मिले तब दादूरामने पूछा कि, आपकी क्या जाति है ? कहाँ रहते हो ? क्या नाम है ? कबीर साहबने उत्तर दिया कि, मेरी जात पाँत कुछ नहीं मैं सब स्थानोंमें रहता हूँ, बूढ़न मेरा नाम है । जो मुझसे प्रेम करता है वही मुझको पाता है, दूसरा नहीं ।

सातवषोंके पीछे दादूरामको सत्यगुरु फिर दिखाई दिये, ददूरामका काम पूरा कर दिया, पीछे दादूरामका धर्म पृथिवीपर प्रचलित हुआ लोग उनके उपदेश ग्रहण करनेको आने लगे, उनकी बड़ी कीर्ति होगई; बूढ़ा बाबा दादूरामका प्रसिद्ध गुरु हुआ ।

गुरुदेव अङ्गकी साखी दादूराम बचन
सामरमें सदगुरु मिले, दिये पानकी पीक ।
बूढ़ा बाबा जस कहे, यह दादू की सीख ॥
मेरे कन्त कबीर है, वर और नहिं वरिहैं ।
दादू तीन तिलाक है, चित्त और न धरिहैं ॥
गोपालदास दादूपन्थी कृत दूसरा विश्राम

दादूरामकी जन्मसाखी

तीजे पहर निकट भई सांझा । खेलत हते सो लडकन मांझा ॥
बीते जबहि एकादश बरसू । बूढ़ा रूप दियो हरि दरसू ॥
साखी - दादू पूछे देव तुम, कौन सो जात कहाव ।

बूढ़ा जाति न पाति है, प्रीतिसँ कोई पाव ॥

चौ०- परम पुरुष परमेश्वरगामी । देव भये पद अन्तरजामी ॥
भव संसार तरन और तारू । ऋद्धि सिद्धि मुक्ती दरबारू ॥
मांग्यो आनि जो पैसा एकू । सब काहूको लियो बिबेकू ॥
बालक दीन्हो बार न लाई । रीझे बाबा सब सुखदाई ॥
विगसे बाबा निकट बुलाई । सकल शरीर हाथ तब लाई ॥
सरस्वति बोल दियो मुखमाहीं । राम दियो भेटे कोइ नाहीं ॥
सरबस देव माथ कर दीनो । बालक बुद्धि जानि नहिं लीनो ॥
एक बुंद पग ऊपर आई । चरणों लागि मुक्ति होय जाई ॥
रहे जो सात बरस घर माहीं । फिर दियो दरस निरञ्जन राई ॥
कर उपदेश भय अन्तरधाना । तब स्वामी प्रगटे ज्यों भाना ॥