भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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दुःख दर्द सब अवश्यही मिट जावेगा वह, बड़ा भाग्यवान् होगा। उसी दिनसे दुःखहरणजी शिवनारायणदासजीके गुरु प्रसिद्ध हुए।

शिवनारायणी लोग इस बातको कि दुःखहरण कबीर साहबका ही नाम है, भलीप्रकार जाननेपर भी कबीर साहबको बिलकुल नहीं मानते। यहाँतक कि, यदि कोई उनसे कबीर साहबको शिवनारायणदासका गुरु कहदे तो उससे बहुत द्वेष करने लगते हैं। वे लोग सत्यगुरुके नामसे ऐसे भागते हैं जैसे कि, दोपहर दिनके प्रकाशसे छुछंदर भागता है। जिस प्रकार चोर जिस धनीका माल चोरी करता है, उसको देखकर उसका नाम सुनकर भागता और अपना प्राण बचाता फिरता है, उसी प्रकार वे सत्यगुरुसे भागते हैं। यदि उनसे कोई पूछ दे कि, शिवनारायणदासका गुरु कौन है ? तो वे उत्तर देते हैं कि, वो स्वयं परमेश्वर हैं, कोई कहता है कि गुरुका नामही दुःखहरण है पर उनसे कोई पूछ दे कि, दुःखहरण कहाँ रहता है ? तो निरुत्तर हो जाते हैं। जैसे कि, नानक साहिबका जिन्दा तथा दादुरामजीका बूढ़ा है उसी तरह शिव नारायण दासजीका भी गुरु दुःखहरण है। शिवनारायणी लोग परवाना बन्दगी आदि तो कबीर पन्थियों जैसे करते हैं पर कबीरको गुरु नहीं मानते। यही कारण है कि, यह पन्थ वाममार्गियों जैसा हो गया है, इसमें अच्छे पुरुषोंकी संख्या कम है। प्रायः नीच जातिके लोग बहुत हैं। इनके आचार व्यवहार विचारने योग्य है। जब कुष्ठम ऋषि जैसे तेजस्वी पुरुषोंकी दशा, गुरु अवज्ञाके कारण भयंकर हो जाती है तो इन लोगोंकी न जाने कौनसी दशा होगी।

पाँप दास

जि. बिजनोर धामपुर नगीनामें पाँपदासजीका जन्म हुआ था, कबीर साहिबकी कृपासे इनका पन्थ प्रचलित हुआ। इस मतके लोग कबीर साहिब और पाँपदास दोनोंके ग्रन्थ रखते हैं। मेरठ दिल्ली सरधना आदिमें इनका पन्थ फैला हुआ है पर इस पन्थकी अधिक उत्पत्ति नहीं हुई है, इस मतके लोग साखी पढ़ते हैं तथा भजन आदि अपने पन्थके नियमके अनुसार करते हैं।

राधा स्वामी

इस मतके प्रवर्तक मुंशी शिवदयालु आगरेके डाक मुंशी थे इनका जन्म भाद्र. व. ८ सं. १८७५ सन् १८१८ में पन्नागली नामके मुहल्लेमें हुआ था। ये बालकपनसेही ज्ञानकी बातें किया करते थे। इन्होंने १५ वर्षतक अपने मकानके एक कोठेपर बैठकर सुरति शब्दका अभ्यास किया था। इन दिनोंमें ये घरसे न तो बाहिर निकलते थे एवं न नित्य क्रियाकी ओर ध्यान ही देते थे। १९१७