कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिताबोंकी तो वहाँतक पहुँचही नहीं, कबीर गुरु तथा स्वसंबेदके अतिरिक्त सत्यलोकका कोई हाल नहीं जानता, फिर आपको और किस गुरु तथा शास्त्रके अनुसार सत्यलोकका नाका प्राप्त हुआ ? उनका कथन है कि, सत्यपुरुषका दर्शन पाया, वह तेजपुञ्ज था उसके एक बालके तेजमें करोड़ों सूर्य और चन्द्र छिप जाते थे । सो इस सत्यपुरुषका दर्शन करानेवाले कौन गुरु हैं ?
फिर ३९४ पृष्ठमें लिखा है कि, एक पद्म पालङ्ग सत्यलोकका घेरा है । एक पालङ्गकी गिनती ऐसे करते हैं कि, यह तीन लोक एक पालङ्ग है । यह बनावट सरासर कबीर साहबके विरुद्ध है । कबीर साहबका कथन है कि, ये तीनों लोक छः पालंगके फैलावमें हैं, एक पालंगमें कदापि नहीं है । हजरतको पालंगकी भी हद्द मालूम नहीं । यदि कबीर साहबके ग्रन्थको देखकर पूरी नकल उतारते तो भी ठीक होता, अटकल पच्छु जो याद आया सो लिखते गये । कुछ शुद्धाशुद्धका भी ध्यान नहीं रखा । यदि पालंगका हिसाब अशुद्ध ठहरा तो सत्यलोकके फैलावका वर्णन झूठ है । जो कुछ उसने लिखा है तो सब कृत्रिम है जैसे गुरु हैं वैसेही शिष्य लोग हैं उनके विचारोंमें ये बात नहीं उपस्थित हुई कि, बिना गुरुके अगमका समाचार कौन कह सकेगा ? यह बही जाने ।
पहलेही उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि, मुक्तिके लिये १-गुरु, २-नाम ३-सत्सङ्ग ; इन तीन वस्तुओंकी आवश्यकता है । भलाजी ? जो स्वयम् निगुरा होगा, उसके मतानुयायी किस तरह गुरुमुख हो सकेंगे ! हाँ यह तो ठीक है कि, आमके वृक्षसे आम, कटहलके वृक्षसे कटहल, अमृतके वृक्षसे अमृत, विष वृक्षसे विषही फल लगेगा । अतः जो स्वयम् निगुरा होगा उसके अनुयायी भी निगुरे ही होंगे । हाँ शिष्य तो अपनेको गुरुमुख मानेंगे परन्तु निगुरेके उपदेशसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।
इस पन्थमें बहुत थोड़े लोग हैं । इसकी विशेष उन्नति नहीं हुई है । राधास्वामीके मतानुयायी लोग कबीर साहबके ग्रंथ पढ़ते हैं । तथा उनकी लिखावट कबीर साहबके अनुसार है । जहाँ उन्होंने कबीर साहबके विरुद्ध अपनी बनावट की है वो स्पष्ट जान पड़ती है । उनके ग्रंथोंमें सब बातें स्वसंबदकी हैं पर कबीर गुरुसे विमुख हैं । राधास्वामी अपनी उपदेश पुस्तकके दूसरे भागमें स्वयं लिखते हैं कि, ब्रह्माको जब कबीर साहबने समझाया तब उसको सत्यपुरुषके खोजनेका उत्साह हुआ पर काल पुरुषने भ्रमित कर दिया फिर जीवमें क्या सामर्थ्य है जो कि, सत्यगुरुकी दया बिना सत्यपुरुषके दर्शनको पा सके ।
इसपर मुझको यह कहना पड़ता है कि, जिस अवस्थामें ब्रह्मा ऐसे जानी