भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 669

नाम गुमान करो शठहारा । हमरे चित डर नाहिं तुम्हारा ॥
हाथ खप्पर मम भुजा अनन्ता । अपने वश कीन्हें भगवन्ता ॥
हम पर धनी और नहिं आना । तीन लोक मम नाम बखाना ॥
तुम कह गर्व करो रे भाई । कहो तो लोक मैं देउँ खँसाई ॥
तुरतहि रूप अनेकन धारुँ । लोक तुम्हार रसातल डारुँ ॥

शठिहार वचन

कह शठहार सुनो हो माया । कहा तोर मति गई भुलाया ॥
जादिन आदि अन्त नहिं जोती । ता दिन कहो कहाँ तुम होती ॥
पुरुष अकार कहो जिन जानी । शब्द डोर तोहि बाँधो तानी ॥
कामिनि तोहि करौं जर छारी । सकल हंसको लेउँ उबारी ॥
आदि पुरुषको तू कस मेटै । छोड़ै पुरुष काल उर भेटै ॥
अस जनि जानो सकल हमारा । देव आप होइहो जरि छारां ॥
हम तो सत्यलोक ते आवा । देवी तुम्हारो ज्ञान हिरावा ॥
पुरुष कीन्ह तोहि तब तुम भयऊ । तीनों लोक बखश तोहि दयऊ ॥
तुम जानी मैं आपन कीन्हा । पुरुष नामते नहिं चित दीन्हा ॥
अलख निरञ्जन देवी राता । विधि हरिहर कहै करिहैं बाता ॥
महा प्रलय आवैं जेहि बारा । तब जरबर होई है सब छारा ॥
तीन लोक परलय तर जाई । तब तुम आद्या कहाँ रहाई ॥
उनसे तू कर कौन गुमाना । जाकर चले जगतमैं पाना ॥
आदि पुरुष तुमरो है ताता । आद्या भयो निरञ्जन भ्राता ॥
ताहि तातको छोड़ेउ संगा । भ्राता जार कीन्ह अरधङ्गा ॥
ताहि रङ्गत गयी भुलाई । छोड़यो पुरुष जार मन लाई ॥
निशिवासर कीन्ह्यो यह नेहा । कामरूप कामिनि मत येहा ॥
तुच्छ बद्धि नारी तुम बाना । यही चाल जगनारि समाना ॥

देवी वचन

यह सुनि माया बहुत लजाई । धरि सिंहासन तब बँठाई ॥
बचन हमार सुनो शठिहारा । नाम जपे सो हंस उबारा ॥
हमतो पुत्री पुरुष की आहू । शब्द डोरि हंसन ले जाहू ॥
जो कोई नाम तुम्हार सुनाई । शीश हमार पावैं दे जाई ॥
चौसठ युग हम सेवा कीन्हा । पृथिवी बखश मोहि प्रभु दीन्हा ॥
तीन लोक मैं मर्दो माना । किमि हंसा कर लोक पयाना ॥