कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 672, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानी देखा दृष्टि पसारी । यहि ते नहीं बचे संसारी ॥
ज्ञानी बोले शब्द परचाई । तुही काल खाये दुनियाई ॥
निरञ्जन बचन
साखी—जाव ज्ञानी घर आपने, मानो बचन हमार ।
तीन लोक मोहि पुरुष दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥
ज्ञानी बचन
चौ०—ज्ञानी बोले शब्द अपारा । मोकहैं पुरुष दीन टकसारा ॥
साखी—हम पठये हैं पुरुष को, करें हंसको काज ।
काल मारि संधार हूँ, दीन सकल मोहि राज ॥
चौ०—मारूँ काल शब्दके झारा । टूटै दन्त कबीर पसारा ॥
निरञ्जन बचन
तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छोड़ाये ज्ञानी ॥
जगके माँहि कीन हम बासा । पशु पछी सबमें मम आसा ॥
तीनसो साठ पेट हम लाई । ताते सकल सृष्टि अरुझाई ॥
जेहि दिनते सो पेट लगाई । दिनदिन अरुझे सरुझि नहिं जाई ॥
तापर काम क्रोध हम डारा । तृष्णा सकल जीव हम मारा ॥
इनमें जीव बँधे सब झारी । कैसे हँसने लेहु उबारी ॥
ता ऊपर कीन्हचों यक काजा । पुण्य पाप हम थापै राजा ॥
शुभ अरु अशुभ दोइ दलसाजा । ऐसै अलख निरञ्जन राजा ॥
ज्ञानी बचन
सत्य शब्द हम बोलें बानी । बचन हमार छूटिहैं प्रानी ॥
गहे शब्द मम मन चित लाई । भजे काल जिव लेब बचाई ॥
काल बचन ।
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥
तीनसौ साठ क्षेत्र अरुझाई । कैसे जीव लेहो मुकताई ॥
गङ्गा यमुना सरस्वती जानी । पुष्कर गोदावरि छौछक्का मानी ॥
बदरी केदार द्वारिका ठयऊ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लयऊ ॥
मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगरनाथ बैठे यमध्यानी ॥
सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आहि यमथाना ॥
हिङ्गलाज जैसे जिव सोई । कालिका नगरकोटमें होई ॥
गढ़ गिरिनार दत्तको थाना । ताहि घेर यम बैठ निदाना ॥