कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 676, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगरजै काल महा विकरारा । सत्रह लक्षलों पाँव पसारा ॥
लपक जीभ यम टूटे तारा । यह बिजली चमकै अधिकारा ॥
ओंठ भयावन दन्त अतिबाढा । मध्य घेर ज्ञानीको डाढा ॥
हमरो पौरुख हम बरियारा । तुम ज्ञानी क्या करो हमारा ॥
ज्ञानी बचन
ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा । पकडे दन्त मुण्ड घुमेरा ॥
मान्यो शब्द पाय कर पेले । तोन्यो सुण्ड समुन्दर मेले ॥
पुरुष स्वरूप तबहीं पुनि धारा । योनि स्वरूप काल औतारा ॥
निरञ्जन बचन
भया अधीन काल करचोरी । तुम सत्पुरुष हम अंश तुम्हारी ॥
तुमसे बाल बुद्धि हम धारा । तुम जीवनके तारन हारा ॥
तुम सत्पुरुष दीन्ह मोहि राजू । अरु मोहि दीन्ह सकल सुख साजू ॥
अब लगि साहब हम नहि चीन्हां । सत्यपुरुष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोउ कर जोरि चरणचित लावा । धन्य भाग्य हम दर्शन पावा ॥
अब मोहि साहब देव बताई । पाऊं चिह्न वंश मुकताई ॥
ज्ञानी बचन
साखी—जो निज मेरा पाइ है, आवे लोक हमार ।
ताको खूट तु मत गहो, सुनो काल बट मार ॥
निरञ्जन बचन
चौ०—हे साहब एक विनती मोरा । वेंरा पायकरहु कछु औरा ॥
ज्ञान कथे अन्ते चित सासा । आवागमनको राख्यो आसा ॥
ज्ञानी बचन
सुनो निरञ्जन बचन हमारा । नहीं हंस वह जीव तुम्हारा ॥
काल बचन
कहे काल तुम भली निकारी । सन्धि देख हम क्रोध उतारी ॥
कीन्ह दण्डवत् और प्रणामा । सुन्न शिखर कीन्ह्यो विश्रामा ॥
ज्ञानी बचन
धर्मदास तब मनमें आई । गाहुर देशमें धारा पाई ॥
सतयुग सत्यनाम मम नाऊ । देही धरि मैं मनुष कहाऊँ ॥
प्रथमैं सतयुग लागा भाई । नूप हीचन्द दे तहाँको राई ॥
तहँवा जाय शब्द गोहराई । जो चीन्हें तेहि लोक पठाई ॥