भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 683

कबीर साहब हांक् मार मार कर कहते हैं कि, ऐ मनुष्यो ! तुम मेरी शरण में आओ और कहीं विश्वास नहीं है । सत्य कबीर वचन शरण अंगकी साखियों :-

साखी-धरमराय दरबारमें, देई कबीर तिलाक ।

भूले चूके हंसकी, मत कोई रोको चाक ॥

कबीर शरणमें आयके, कहा मुक्तिको रोय ।

प्रेम पिछोरे ओढ़के, सुख मन्दिरमें सोय ॥

बोले पुरुष कबीरसे, धरमराय कर जोर ।

तुम्हरे हंस न चम्पिहौं, दोहाई लाख कडोरा ॥

कबीर-जो जाकी शरणें गहे, ताको ताकी लाज ॥

उलट मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥

इस प्रकार कबीर साहब बहुत कहते चले गये हैं और शरणागतका गुण बराबर प्रगट करते गये हैं धर्मरायसे प्रतिज्ञा हो चुकी है कि, जो मेरा नाम ले तुम उसको कदापि न रोकना । यदि रोकोगे तो दण्ड पाओगे । सुतरां ग्रन्थ अम्बुसागरमें लिखा है कि, कबीर पन्थियोंमेंसे कितनेही मनुष्योंने भूलसे पाप किया । उन पापोंके कारण उन्हें यमराजने पकड़ लिया परन्तु कबीर साहबने दूतोंको दण्ड दिया अपने हंसोंको छुड़ा लिया ।

शरणागतके धर्म

शरणागतका यही धर्म है कि, जो कोई जिसकी शरणमें हो उसके शरणके नियमोंपर पूर्ण रीतिसे चले । शरणके नियमोंमें तो पूर्णतया प्रेम आवश्यक है । जैसे मछली पानीसे इतना प्रेम करती है कि, पानीसे न्यारी होतेही मर जाती है । अपने प्यारके शरणको ऐसीही दृढ़तासे पकड़े कि, छूटने न पावे । केवल शरणका ही भरोसा रखे, दूसरी ओर तनिकभी ध्यान न दे । यदि कोई दूसरे प्रकार करे तो शरणागति छूट जायगी किसी देवी देवताकी ओर ध्यानही न दे, जबसे जीव सत्य गुरुकी शरणमें आवे तबसे कदापि दूसरी ओर न झुके । केवल सत्यगुरुकीही शरण द्वारा जीवकी मुक्ति होती है । धर्मदासजीने कबीर साहबसे पूछा कि, हे सत्य-गुरु ! मैं किसको जप कर पार उतरूँ ? तब कबीर साहब ने जोरसे पुकार कर कहा कि -

शरण मोर गहि उतरो पारा । बार बार मैं यही पुकारा ॥

मुखसे कहो कबीर कबीरू । तबही मिटै कालकी पीरू ॥

जो कोई सत्यगुरुके शरणमें है । वह उस प्रकार बिनती करे जैसा कि,