भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 692

तीन सत्य जब परगटें, विषका अमृत होय ॥
कहैं कान्ति छबि बरणौं, बरणत बरणि न जाय ।
कबीर-चिकुरनके' उंजियारते' विधु' कोटिक' शरमाय' ॥
जहां पुरुष सतभाव है, तहां हंसनको वास ।
नहीं यमनको नाम है, नहि तृष्णा नहि आस ॥
हर्ष शोक वहि घर नहीं, नहीं लाभ नहि हान ।
हंसा परमानन्दमें, धरें, पुरुष को ध्यान ॥
नहि देवी नहि देव है, नहीं वेद उच्चार ।
नहीं तीरथ नहि वरत है, नहि षट्कर्म' अचार ॥
उत्पत्ति प्रलय वहां नहीं, नहीं पुण्य नहि पाप ।
हंसा परमानन्दमें, सुमिरैं सद्गुरु आप ॥
नहि सागर संसार है, नहीं पवन नहीं पानि ।
नहि धरती आकाश है, नहीं ब्रह्मा नहीं निशानि ॥
चन्द सूर वा घर नहीं, नहीं करम नहि काल ।
मगन होय नामहिं गल्हो, छुटि गयो जञ्जाल ॥
सुरति सनेही होय तासु, यम निकट नहि आवे ।
परम तत्व पहिचान, सत्य साहब मन भावे ॥
अजर अमर विलसे नहीं, परम पुरुष परकाश ।
केवल नाम कबीरका, गाय कहें धर्मदास ॥

गोरखजीका प्रश्न

कवित्त-कर्त्ताको स्वरूप कौन, अण्डका स्वरूप कौन, अण्डपार कौन नाद
बिंद योग कौन है । जीव ईश्वर भोग कौन, भूमि औतार कौन, निराकार कौन
पाप पुण्य करे कौन है ॥ वेद औ वेदान्त कौन, वाच और अवाच कौन, चन्द्र सूर्य
भास कौन, ओहं सोहं कौन है । पञ्चमं प्रपञ्च कौन, स्वर्ग नर्क बसे कौन । पिण्ड
ब्रह्माण्ड कौन जरा मृत्यु कौन है ? आत्म, परमात्म, काल, गुरु सिख बोध कौन,
क्षर अबर अक्षर निरक्षर कौन है ? ॥

गोरखके प्रति कबीरजीका उत्तर

कवित्त-जाते भयो अण्ड स्वप्नरूप बसें अण्डमार्हिं, कर्त्ताको स्वरूप नार्हिं
अण्डको स्वरूप हैं । नादबिन्द योग स्वप्नजीव ईश भोगस्वप्न, भूमिआव तार
निराकार स्वप्नरूप है ॥ पाप पुण्य करे स्वप्न वेद औ वेदान्त स्वप्न वाचा औ