भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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दिवसके बालकके समान थे। जब कबीर साहब पाँच वर्षके बालकके स्वरूपमें रामानन्द स्वामीके समीप थे वही बात कहते रहे, वही बात धर्मदास तथा राजा वीरसिंह इत्यादिसे भी कही। वही बात नब्बे वर्षकी अवस्थामें शाह सिकन्दर लोदोसे कही है। वही बात मुहम्मद साहबसे मोरआजके समय कहीं, उनको कोई सन्देह नहीं रह गया। मुहम्मद साहबसे प्रतिज्ञा हो गयी कि, जब आप मुझको फिर मिलोगे तब मैं आपके साथ लोकको चलूंगा। मुहम्मदसाहबको मुक्तिपानका बीड़ा दिया और कहा कि, अब तो तुम यह बीड़ा लो फिर तुम्हारे अनुयायियोंको मिलेगा और सब मुक्ति पावेंगे, तुम अब इसलाम धर्मको प्रचलित करो, तुम्हारे ऊपर जगदीश्वरी कृपा है, मैं अब भारतवर्षमें जा, रामानन्दको अपना गुरु बनाकर अपना धर्म प्रचलित करूँगा। यही बात सुलतान इबराहीम अहम इत्यादिसे कहते चले आये हैं कि, मैं समस्त संसारका मुक्तिदाता हूँ, इसी प्रकार अधिकारियोंको भी अपना तेज दिखाते आये हैं। यह बात सदैवसे होती चली आई है कि, जिन लोगोंने कबीर साहबका पूरा पता पाया वे तो समस्त काम क्रोधादिपर अधिकृत हुये पर जिन्हें पूरा चिन्ह न मिला योग्यता में कुछ न्यूनता रह गई उनको भी भविष्यके लिये आशा दिलायी गयी। इस सत्यगुरुका प्रताप तीनों कालमें समान रूपसे छा रहा है। यदि अन्धा सूर्यको न देखे तो इसमें सूर्यका क्या दोष है।

जिन्हें अपने पुण्यका घमण्ड हुआ है तथा सद्गुरुके शरणमें न आये वे सभी फँसे रहे एवं जो लोग अपनी योग युक्ति और समाधि आदिका गर्व रखते हैं वे ध्यानपूर्वक देखलें कि, गोरखनाथसे बढ़कर इस संसारमें कोई नहीं हुआ उन्होंने भी बाहर भीतरकी चारों ओरोंसे देखकर इस साहबकी शरण ली और पूर्वकालमें बढ़कर जो योगी हुये थे उन्होंने भी कबीर साहबकी शरण लेकर मुक्ति पथ पाया है। दूसरी युक्तिसे किसीको राह नहीं मिली। संन्यासियोंमें दत्तदिगम्बरसे बढ़कर भी जो कोई संन्यासी हुआ वे भी सद्गुरुकी ही शरण ली। वैष्णवोंमें रामानन्द सबसे श्रेष्ठ हैं। उन्होंने भी साहबको शिष्यके रूपमें स्वीकार किया, जैनियोंमें ऋषभनाथसे बढ़कर कोई नहीं हुआ वे भी सत्यगुरुको पहचानकरही भ्रमसे अलग हुये। षट्दर्शन तथा छचानवे पाखंडमें जिन लोगोंने सद्गुरुको पहचानकर शरणली, उनको सुख मिल गया। इसी प्रकार विदेशीय मनुष्योंमेंसे भी जिनने उसे पहचाना वे आनन्दको प्राप्त हो गये मुहम्मदसे बढ़ कर कोई मुसलमान नहीं हुआ उनको भी उसीने श्रेष्ठ पद दिया। जितने पीर पैगम्बर इस पृथिवीपर प्रगट हुए, जिसको उसने उबारा तथा प्रतिष्ठा