कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 699, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुण्य, यज्ञ और प्रार्थना इत्यादि सांसारिक शुभ कर्म हैं । उन सबका लक्ष इसी ओर है । जो कोई परमेश्वर की पूजा किया चाहे वह कबीर साहबके चरण पकड़े क्योंकि, बिना उस सत्यगुरुकी दयाके किसीको परमेश्वरकी पूजा मालूम नहीं होती । सब मनुष्य गपाटामें लग रहे हैं, । किसीको सत्यकी सुधि नहीं कि, सत्य वस्तु क्या है ?
अनगिनती ब्रह्माण्डोंका रचयिता स्वामी जो जगद्गुरु जगदीश्वर है वो अपनेको एक साधारण मनुष्यके सदृश संसारमें छिपाये फिरता है । वह परमेश्वर अपनी सृष्टिमें ऐसा छिप रहा है कि, जैसे दूधमें घी छिपा हुआ है । वह प्रत्यक्षमें हाँक मार मार कर कहता और पुकारता फिरता है कि, ऐ मनुष्यों ! तुम मुझको पहचानो, मैं समस्त संसारका रचयिता तथा परमेश्वर हूँ । मेरी शरणमें आओ, मैं तुमको यमकी फाँसीसे बचा दूंगा । दूसरे किसीमें ऐसा सामर्थ्य नहीं है कि, तुम्हारा छुटकारा कर सके । वह जो कुछ कहता है सो प्रत्यक्षमें अपने ऐश्वर्य का तेज प्रगट दिखलाभी देता है किसी दूसरेमें यह सामर्थ्य नहीं सहस्रों जन परमेश्वरीका दावा करते हैं पर दिखला नहीं सकते, इसी कारण उनका दह दावा झूठा है, इस कारण वे कालके जालमें फँसेंगे उसके अनुयायी नष्ट भ्रष्ट होंगे । उसीका दावा करना सच्चा है जो दावा करे वही प्रत्यक्षमें दिखला भी दे । जो दावा करके दिखला न सके वह दावा करनेवाला झूठा है । वह अवश्यही आपत्तियोंमें फँसेगा उसके पीछा करने वाले भी उसीके समान नष्ट होंगे । वही एक सच्चा साहब है जो कुछ कहता है वह कर दिखाता है, वही अद्वितीय है और वही समस्त हंसोंका पार उतारनेवाला है सिवा उसके दूसरा कोई नहीं है ।
समस्त संसारके रचयिताने तीन युग अर्थात् सत्ययुग, त्रेता, द्वापरमें इस प्रकार स्वयम् स्थान स्थान पर फिर कर लोगोंको मुक्ति प्रदान की, जब चौथा युग कलियुग आया निरञ्जनके साथ नै वचन हो चुका था वह पूरा हो गया तब साहबने अपना पन्थ पृथिवीपर प्रचलित करना चाहा अपने विशेष अंशोंको पृथिवीपर भेजकर धर्म प्रचारकी इच्छा की । तब सुकृतिजी (धर्मदास) को पहले आज्ञा दी कि, तुम चलकर संसारमें अब सत्यपन्थका प्रचार करो । तुम्हारे बयालीस वंश पृथिवीपर पन्थ चलावेंगे, जगत्की गुरुवाई करेंगे । उस सब स्वामियोंके स्वामीकी आज्ञानुसार धर्मदासजी पृथिवीपर आये, बाँधो गढ़में प्रगट हुये । साहबने देखा कि, हंसोंका बादशाह धर्मदास पृथिवीपर जा चुका है । तब सत्यगुरुने रामानन्दजीको भेजा कि, बनारसमें जा रहो, मैं तुम्हें अपना गुरु करके भक्तिका प्रचार करूँगा ।