कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 705, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी ओरसे जानते थे । सुतरों मने एक पुस्तक “तिब्ब बनवी” में लिखा हुआ देखा था । वह उदाहरण में यहाँ लिखता हूँ कि—बलूचिस्तानका एक नबी था, वह नपुंसक हो गया था तब खुदासे प्रार्थना की कि, प्रभु मुझे पुरुषत्व प्रदान कर; जिससे मैं अपनी स्त्रीको प्रसन्न कर सकूँ । तब आकाशवाणी हुई कि, बाजीकरणके लिये खूब माँस खाया करो, वह पैगम्बर उसको खुदाका कलाम समझकर उसीके अनुसार करने लगा । जैसी हृदयकी इच्छा होती है वैसीही आकाशवाणी बोलती है । जिसको परमेश्वरकी तनिक भी पहचान नहीं हुई उसके लिये परमेश्वरी वाणी नहीं हो सकती, वो किसी ऐसे ही प्राणीकी हो सकती है इस प्रकार समस्त पीर पैगम्बरोंने धोखा खाया । सत्य और झूठको बिना बूझे योंही पापमें फँसे ।
ऊपर कहे हुए तात्पर्यको एक गजलमें कहते हैं—
बनी आदमको क्या उसकी खबर है । खुदा है याकि शेर इनसान दर है ॥
फिकिर और सोच है दिलमें न उसको । गुनहमें दिन बदिन यह तरबतर है ॥
खुदासे है सदा यह आसमानी । मालिक जिन वो परी या कोई नर है ॥
है वे गुरुज्ञान जाहिल आदमी यह । वही दाना जिसे हककी खबर है ॥
जिसे झूठ सचकी हो न पहचान । वही हैवान मुतलक सरबसर है ॥
मकहर कर दिया दिल आईन को । यह नफसानी हवस जुलमात घर है ।
तअस्सुवमें फँसे इनसान सारे । न तालीम और तलकीन कारगर है ॥
हमारा पेशवा मजहब बड़ा है । कहे सब ख्वाव गफलतका खुमर है ॥
पसन्दीदा न हो राहरास्त इसके । यह बद अमलोंका अपने सब समर है ॥
ज़हरको जिन्दगी दारूय जाने । हयाते—आब कह कातिल ज़हर है ॥
सभीको नाग मलकुलमौत काटे । तअस्सुब तार उसकी सब लहर है ॥
हकीकी यार पहचाने जो आजिज़ । वही सब आदमीमें बहरेवर है ॥
यह मन तीनलोकका परमेश्वर है । पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनोंपर यह अधिकृत और शासक है । यह मन काल पुरुष और विराट्रूप है । सब जीवधारी इसके आधीन हैं । यह कदापि किसीके वशमें नहीं आता, न कोई इसको अपने आधीनही कर सकता है । जो कोई इसको आधीन किया चाहता है, पहले उसीको धोका देकर यह मार लेता है । बड़े बड़े ऋषि मुनि और तपस्वियोंको इसने मार लिया पर यह कभी किसीके वशमें नहीं आया । जब यह मरता है तब ही ज्ञानका प्रकाश होता है, बिना इसके मरे नहीं होता; इसी कारण कबीर साहिबने लिखा है कि—