कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 741, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ें८ आकाशमय कोष—मूल प्रकृति । देह पूर्णगिरी । स्थान निराश्रय लोक । ईश्वरगुण । अहम् भूमिका । मध्याह्न अवस्था । ब्रह्म अग्नि । कुम्भकवायु । आत्म भावनी मुद्रा । आनन्दाकाश । तुरियावस्था ये हैं ।
९ विज्ञानमय कोष—कैवल्य देह । भ्रमर गुफास्थान । तुरियातीत अवस्था । अन्तःकरण भूमिका । सर्वाधिष्ठान कलातीत कला । भावातीत भाव । पूर्ण बोधनी मुद्रा । निजाकाश । स्फूर्ती वायु । जैसाका तैसा । आत्मा आत्मा गुण । निर्गुण निर्गुण ब्रह्म । ये नौ कोष इस जीवके घर ठहरे । इन्हींमें यह भ्रमा करता है । जिस घरमें पहुँचता है वँसाही बन जाता है ।
आयु
इन पाँचों अहंकार तथा नौओं कोषोंमें जितने परमेश्वर और सेवक फँसे हैं सबकी आयु धन बल और विद्या आदि सभौका अन्त होता है । अंत रहित इसमें कोई नहीं । इस पर मैं कबीर साहबका वचन लिखता हूँ —
छन्द — जग चारो चल जाय चौकड़ी एक कहावे ।
तेउ बहत्तर जाँय इन्द्र यकराज करावे ॥
जाँय अठाइस इन्द्र विरञ्ची कोर भजीजे ॥
ऐसे दिनन सौ बरस विधि की आयु सुनीजे ॥
ब्रह्मा सहस व्यतीत विष्णुको घण्ट बजीजे ।
विष्णू द्वादश जाँय रुद्रकी पलक पुरीजे ॥
रुद्र एकादश जाँय ईशकी निमिष कहीजे ॥
ईश सहस चलजाँय शक्ति संहार करीजे ॥
शक्ति सहस चलजाँय कल्पका भेद जो लीजे ॥
विधि पति सोई कहत हैं भयाकल्प परमान ॥
कहैं कबीर अनगणित हैं गणित न आवे ज्ञान ॥
इन आयु और श्रेणियोंके ऊपर जो बड़ी बड़ी श्रेणियोंके प्रतिष्ठित पुरुष हैं उनका क्या हिसाब कहा जाय ? वो मनुष्य की समझमें क्या आवे । यह सब सीमाके भीतर हैं । इन सभोंका अन्त है । अनन्तको कौन जाने ?
सत्त्व तीन लोककी परमेश्वरी कर रहे हैं । सत्त्वकी उच्चश्रेणीपर कितने सन्त अधिकृत हैं उसकी इनको कुछ खबर नहीं है इन ऋषियोंसे बढ़ कर और भी ऋषि हैं उनसे बढ़कर भी और हैं । उनसेभी बढ़कर और हैं । इस प्रकार कितने ऋषि मुनि एक दूसरेसे उच्च श्रेणीपर अधिकृत हैं । केवल शक्ति तथा प्रभावमें सीमाबद्ध हैं । इन ऋषीश्वरोंके सामने मनुष्य क्या वस्तु और क्या बल रखता है।