कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 765, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसीने इस खुदाको कभी न पहचाना और न कभी किसीको खुदाके पहचानकी विद्या प्राप्त हुई खुदाकी खुदाईको तो सब मानते हैं पर उसका पता ठिकाना किसीको नहीं मालूम हुआ कि, सच्चा खुदा कौन है ?
मूसाकी दूसरी पुस्तक खुर्रुजमें लिखा है देखो (२४) बाबके (९) और (१०) आयतमें मूसा, हारूँ और नदब इत्यादि बनी इसराईलके प्रतिष्ठित लोग पर्वतपर गये । इसराईल ने खुदाको देखा । उसके पांवके तलेकी नीलम पत्थर जैसी गचकरी थी । उसका स्वच्छ शरीर आकाशके रङ्गका था । बनी इसराईलके अमीरोंपर उसने अपना हाथ न रखबा । उन्होंने खुदाको देखा और खाया पीया यह खुदा कौन है ? इसकी तो उन्हें पहिचान भी नहीं है । मनुष्योंमें दो शक्तियाँ हैं । एकका नाम विक्षेप तथा दूसरीको आवरण शक्ति कहते हैं । इन्ही दोनोंमें खुदा और बन्दे फँसे हुये हैं । विक्षेपशक्ति तो वह है जो कभी होती और फिर अन्तर्धान हो जाती है । जब विक्षेपशक्तिवाला तुरियातीतकी श्रेणीको प्राप्त कर लेता है तब समस्त संसारका रचयिता होजाता है । आवरण शक्तिवाले समस्त निर्बोध जीव हैं । मनुष्य तथा पशु सभी इस आवरण शक्तिसे घिरे हुये हैं, जो कोई विक्षेप और आवरण दोनोंको पार करके पद पाता है सो परमधामको जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव इत्यादि सब उसके सेवक बन जाते हैं । जबतक आवरण तथा विक्षेप दोनों श्रेणियोंको न जाने तबतक मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त नहीं कर सकता विक्षेप शक्ति तथा आवरण शक्तिके भीतर सब फँस रहे हैं । क्या ? अन्तर्धामी खुदा और समस्त संसारकी शरण देनेवाला इस प्रकार आज्ञा देगा ? कि, मेमनोंके रक्तका छापा अपने द्वारोंपर लगाओ । क्या अन्यान्य रङ्गके छापे नहीं लगाये जासकते थे ? क्या वह बिना छापेके चिन्हके मिश्रियोंको मार नहीं सकता था ? इतने जीवोंका रक्तपात करने करानेकी क्या आवश्यकता थी ? जिस खुदाने फिरऊनके मनको कड़ा किया था वह नरम करनेका सामर्थ्य भी रखता था । मनुष्योंसे पाप करने करानेका क्या मतलब ? क्या यही मतलब कि, मनुष्य पाप करते जावें और बन्धनमें फँसे रहें । मैं यदि मनुष्य हूँ तो निर्दोष मेमनोंका रक्तपात क्यों करूँ, अपने हाथोंको पापोंसे कलुषित क्यों करूँ, जिसने फिरऊनका मन पत्थर की तरह किया था वही नरम करे या न करे । झूठ और सच कहनेवाली की गरदन पर (परन्तु मनुष्यका क्या करे विवश होकर गति करता है और कालपुरुषके फन्देमें पड़ा है । यदि रक्तके ही चिन्हसे खुदाको यहूदी तथा मिश्रीकी पहचान होती थी तो यदि मिश्रियोंका समाचार मिलता तो वे भी अपनी चौखटों पर रक्त का छापा लगाकर खुदाको धोखा देते । मेरी बातें कोई ज्ञानी साधू विचारमान संमझेगा सबकी समझमें नहीं आ सकती ।