भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उसके चिन्ह ये हैं । उस मनुष्यमें आलस्य, नौंद, चोरी, चुगली, निन्दा इत्यादिके दोष रहते हैं । घर घरमें आग लगाता है, उसमें विषय वासनाकी कामना अधिकता से पाई जाती है । देवी देवता भूतप्रेतादिकी पूजा किया करता है । कभी रोता है कभी मङ्गल गाता है दूसरेको दान पुण्य करता देखकर दुःखी होता है । सत्यगुरु को नहीं पहचानता । वेदशास्त्रोंको नहीं जानता । दूसरोंको तुच्छ तथा अपनेको बुद्धिमान समझता है । कभी नहाता नहीं कपड़े मैले रखता है । उसकी आँखोंमें कीचड़ भरा रहता है मुंहसे लार टपका करती है । जूवा चौसर आदि खेलोंमें संलग्न रहता है इसका सिर कुबड़ा तथा पैर लम्बे होते हैं ।

२-ऊशमजसे मनुष्य होनेके चिन्ह — जो कोई उषमजखानिसे मानुषिक शरीरमें आता है उसके यह चिन्ह हैं कि, वह खूब आखेट करता है । आखेट करने तथा जीववधसे बहुत हर्षित होता है । माँसको पका पकापर भक्षण किया करता है । वह गुरुको कुछ नहीं मानता । अपने गुरुसे अपनेको अच्छा जानता है । गुरु तथा नामकी निन्दा करता है, सभामें मिथ्या भाषण करता है बहुत बातें करता है । टेढ़ी पगड़ी बाँधता है उस पगड़ीका किनारा दामन तक लटकता रखता है उसके मनमें तनिक भी दया धर्म नहीं होता जिस किसीको दान पुण्य करते देखता है उसकी हँसी करता है । बड़ी चटक मटकके साथ गली कूचोंमें फिरा करता है । गुप्तमें तो पाषाण हृदय और निर्दयी है परन्तु प्रगटमें वह बहुत आवभगत किया करता है । प्रत्यक्षमें वह दयालु जान पड़ता है परन्तु यथार्थमें वह भयानक शैतान है । उसके दाँत लम्बे होते हैं उसका चेहरा भयानक होता है उसकी आँखे उभरी हुई होती हैं ।

३-उद्गिरजसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो अचलखानिमेंसे मनुष्य देहमें आता है उसके चिन्ह ये हैं कि, उसकी बुद्धि पारे की तरह चञ्चल रहती है । एक काम करनेको प्रस्तुत हो जाता है आगे शीघ्रही उससे फिर जाता है, खूब सज धजके पगड़ी बाँधता है, बादशाही दरबारमें नौकरी करता है । घोड़े पर खूब सवार होता है तलवार तथा कटार आदि कमरसे लगाता है, समय पाकर इशारेसे पराई स्त्रीको बुलाता है । व्यभिचारके लिये छिपकर पराये मकानमें जाता है । उसको तनिक भी लज्जा नहीं आती । एकक्षणमें तो प्रार्थना करता है दूसरे क्षण अपने परमेश्वरोंको भूल जाता है । एक क्षणमें तो वीर हो जाता है दूसरे क्षण नामर्द तथा डरपोक होकर भाग जाता है । एक क्षणमें सुकर्म तथा दूसरे क्षणमें कुकर्म करने लगता है भोजन करनेके समय अपना शिर खुजलाता जाता है । अपनी भुजा तथा जाँघ मलता जाता है भोजन करके सो जाता है । सोते हुये जो कोई उसको जगाने आवे तो उसको मारने दौड़ता है उसकी आँखें लाल होती हैं ।