भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 783

इससे मानुषिक शरीरको छोड़कर पशुओंमें परिभ्रमण किया करता है । वहाँ रोना तथा दांत पीसना होता है । क्योंकि, पशुकी देहसे किसीकी मुक्ति नहीं हो सकती । अन्तमें नरकमें प्रवेश करता है जहाँ रोना तथा दांत पीसनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह जाता ।

२०—योहन्नाकी इंजीलमें आवागमन—योहन्ना की इञ्जीलका (१०) बाब (८) आयत देखो । सब जितने मुझसे आगे आये वे सब चोर और बटमार हैं । पर भेड़ोंने उनकी नहीं सुनी । द्वार मैं हूँ यदि कोई मनुष्य मुझसे प्रवेश करे तो मुक्ति पावेगा । भीतर बाहर आवे जावेगा और चरनेकी जगह पावेगा । अर्थात् हजरत मसीह फरमाते हैं कि, जितने मुझसे आगे आये हैं वे सब चोर तथा बटमार थे, मनुष्योंको भटकानेवाले थे । मैं द्वार हूँ यदि कोई मुझसे प्रवेश करेगा तो वह मुक्ति पावेगा भीतर बाहर आवे जावेगा । द्वार मैं हूँ इससे यह तात्पर्य है कि, मुझे बिना किसीको मार्ग न मिलेगा । क्योंकि, समस्त कार्योंका उत्तर दाता मैं ही हूँ । इसी कारण मसीह सारे नबियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं । यहाँ मुक्तिके अर्थ एक शरीरके कर्मोंसे छूट जानेका है, एक देहके कर्मोंसे छूटा और दूसरा देहके कर्मोंमें लबक रहा । भीतर बाहर जानेसे तात्पर्य तना सुखसे है । अर्थ यह कि, जीव पिता होकर भीतर जाता है और पुत्र होकर बाहर निकलता है । जब एक शरीरको छोड़ता है तब दूसरा शरीर अपने लिये बनाता है और सदैव आवागमन किया करता है । चरनेकी जगह पानेसे यह तात्पर्य है कि, चरनेका स्थान चौपायोंके निमित्त है । मनुष्यके निमित्त नहीं । जिसके आवागमनका सम्बन्ध टूट गया वही मनुष्य है । शेषके समस्त पूर्ण पशु हैं, यद्यपि मनुष्यके स्वरूपमें दिखाई देते हैं । जितने लोग मुक्तिके निमित्त उद्योग नहीं करते न मुक्तिकी सुधि रखते हैं वो सब पूरे पशु हैं ।

२१—कयामतसे भी पहिले आवागमन—लूकाकी इञ्जीलका (१६) बाब (१९ से ३१) आयत पर्यन्त यह है कि, लाजर नामक एक दरिद्री था । उसके समस्त शरीरमें घाव थे वह बिचारा विवश होकर एक धनाढ्यके द्वारपर पड़ा रहता था, कुत्ते उसके घावोंको चाटा करते थे । अमीरके नौकर उस अमीरके रसोईसे जो जूठा चूर चार गिरता था उन सबको इकठठा करके उस लाजरके सामने रखते । लाजर वही जूठा तथा चूरचार खाकर जीता था, अन्तमें लाजर मर गया, जब वयस समाप्त हुआ तब वह अमीर भी मर गया । लाजर तो मरकर बँकुण्ठको एवं वह अमीर नरकको गया । उसने जो नरकमेंसे दृष्टि उठाकर देखा तो लाजरको बँकुण्ठमें इबराहीमके गोदमें बैठे पाया । उसको देखकर