भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 787, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 787

ऐ खुदा ! मैं अमुक स्वरूपका एक फल लाता था । वो फल मेरे हाथसे छूटकर गिर पड़ा । तब खुदाकी ओरसे आवाज आई कि, ऐ जिबराईल ! मत घबरा, क्योंकि, वह फल जहाँ पहुँचने को था पहुँच गया, तेरा काम हो चुका । वे सब फल जो उस बागमें थे वे तो मुहम्मदके पीछा करनेवाले हैं सबसे श्रेष्ठ फल स्वयम् मुहम्मद साहब रसूल अल्लाह हैं ।

पहले मुहम्मदसाहबकी आत्मा मयूर पक्षीके शरीरमें गयी, फिर उस फलमें, इसके उपरान्त बीबी एमनाके गर्भमें । यह तीनों बेरका आवागमन प्रत्यक्ष हदीसोंमें लिखा है इनके अतिरिक्त जो अनगिनती बेर उनकी आत्माने किन किनके बीचके समय समयपर आवागमन किया है उसका हाल परमात्मा जाने ।

२९—शैतानका आवागमन—तफसीर अजीजी इत्यादिसे प्रगट है कि, जिस समय खुदाने आदमको अदनकी वाटिकामें रखा था उस समय जिबराईलको ऐसी आज्ञा दी थी कि, आदमका पेट फाड़ डाले आधा रक्त तथा शैतानी हृदय पृथक करे । जिबराईलने ऐसाही किया । आधा शैतानी रक्त और आधा हृदय आदमके पेटसे पृथक किया, आधा उसके भीतर रहने दिया । जब वह आधा रक्त तथा कलेजा आदमके पेटसे निकालकर अदनकी वाटिकाके एक कोनेमें गाड़ दिया । उसी शैतानी रक्त तथा हृदयसे गेहूँका वृक्ष उत्पन्न हुआ । उसीके फल खानेके लिये खुदाने वर्ज्य था । वह आधा शैतानी रक्त तथा हृदय आदमके भीतर रह गया था । जिससे शैतानी धूर्त और अत्याचारिणी सृष्टि उत्पन्न हुई । वह दूसरा आधा जो स्वच्छ हुआ था उससे अच्छे लोग उत्पन्न हुये । इससे प्रमाणित हुआ कि पहले शैतान आदमके भीतर था, इसके उपरान्त रक्त तथा हृदयके साथ गेहूँमें प्रवेश कर गया । जब आदमने उस गेहूँके दानेको खाया—तब शैतानने आदमकी बुद्धि विलुप्त कर दी, विजयी हुआ आज़ोल्ले—घनके पहले शैतान बाहरी स्वरूप धरकर धोका देता था फिर भीतर तथा बाहर ये आदम तथा आदमजादको धोका देने लगा वे सब शैतानके वशीभूत हुये ।

३०—समीक्षा—पूर्व लिखित प्रमाणके अनुसार खुदाने सबसे पहले मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया, एक विश्वासका वृक्ष भी उत्पन्न किया । उसके ऊपर मुहम्मदकी आत्माको मयूरके स्वरूपका बनाकर बैठा दिया, वह उस वृक्षपर बैठकर सत्तर सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या करता रहा, पहले तो यही असम्भव है कि, पवित्रात्मा खुदाकी वन्दना करे क्योंकि, उसे प्रार्थना की आवश्यकताही नहीं होती, खुदावन्दना तथा आशिक और माशूक, केवल अपवित्र आत्माओंमें हैं । जब आत्मा अपने पूर्वकम्मासे अपवित्र होती है तब उसे प्रार्थनाकी