भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 820

हुआ इन्द्र मुनिन्दर को न पाया । वजह है यह सो फिर योनि में आया ॥
कभी यह स्वर्गमें डेरा बनाया । रसातलमें कभी खेड़ा बसाया ॥तना०॥
कभी आदम कभी हो यह फरिस्ता । न हरगिज टूटता कर्मोंका रिश्ता ॥
अमर भी मर गये पाया न रस्ता । हुये गुरु ज्ञान बिन सब ख्वार खिस्ता ॥त०॥
कभी ईश्वर कभी कीड़े मकोड़े । भजन सुमिरनसे दिल अपना न जोड़े ॥
हुये सब नास्ति जो रह रास्त छोड़े । जो गोड़े ज्ञान यह मनुवा निगोड़े ॥तना०॥
जो करते सब जहाँ की बादशाही । हजारों लौडिया लाखों सिपाही ॥
हुये जिस दम अदम आलमके राही । हुये सो बिलके चूहे जलके माँही ॥तना०॥
किया नेकी बदी ताना व बाना । पसारे कारगह पुर तीन अपना ॥
बुने कपडे लगा उनपर निशाना । पहन सब जीवपडे यम कैंदखाना ॥तना०॥
फरिश्ता आदमी हैवान हशरात । सभी जीव जो नवातातो जमादात ॥
गजब शहवत सभीमें सद खराफात । रहे आवागमनके फन्द दिन रात ॥तना०॥
सुना आदम फरिश्ता और न कोई भूत । गजब शहवतसे जिसका टूटा न हो सूत ॥
कुवें बाबिल लटक हारुतो मारुत । कि जोहरा इश्कसे जिनको लगी छूत ॥त०॥
यह काम क्रोध लोभ और मोह जञ्जाल । पडे इस फन्दमें सबही बुरे हाल ॥
बना सारा इन्हींसे कर्मका जाल । न जाने रब हुये सब वे परो बाल ॥त०॥
जलन्धर घर गये विष्णु विश्वंभर । हुये कर्मोंसे वह भी अपने पत्थर ॥
गणेशो शेष शारद गौरीशङ्कर । करमके फन्दमें फिरते हैं दरदर ॥त०॥
अवस्था चार जीवकी भरमना है । बुढ़ापा ज्वानी और बालकपना है ॥
फकीरी और गरीबी और फवा है । यह मुखिया सब दशा दुखिया बना है ॥त०॥
तनासुख जानिये ज्यों रैन सपना । भरमना भूलकर जीव रूप अपना ॥
हराई होवे जब सतनाम जपना । परस्तिश और में नाहक न खपना ॥त०॥
किया जप तप रहे सब ज्ञान खाली । चढी उनपर नहीं लालाकी लाली ॥
ऐ आजिज अपनी कर अब गोशमाली । वह छुटकारेकी बातें हैं निराली ॥त०॥

८७—यह तनासुख बिना पूर्ण प्रकाशके नहीं जाना जा सकता । जब तक भली प्रकार न विचारे तब तक इस प्रकाशके योग्य नहीं होता । शरीराभिमानमें सुधि नहीं हो सकती ।

८८—पशुओंकी बुद्धि और चाल चातुरी, आवागमनको भली भांति प्रमाणित करती है । तनिक भी सन्देह नहीं रहता ।

८९—हदीसोंमें है कि, अकाशोंमें फरिश्ते हैं जिनका स्वरूप भिन्न भिन्न प्रकारका है । कोई आधा बैल आधा मनुष्य, इसी प्रकार उनके अनगिनती