भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जा, फिर मत आइयो। इतनी बात सुनतेही वह कुत्ता पलटकर गौवके बाहर आया, एक तालाबके समीप जलके किनारे वृक्षकी जड़पर अपना शिर रखकर लम्बा पड़ गया। जब भोजनका समय आया तो जमींदारकी स्त्रीने कहा कि, आज डब्बू नहीं आया, न जाने कहाँ है लोगोंने समाचार दिया कि, डब्बू तो गौव के बाहर जलके किनारे पड़ा हुआ है। जमींदारने जान लिया कि, डब्बू मेरी झिड़कियोंसे असन्तुष्ट हो गया, रोटी तथा लस्सी लेजाकर उसके मुंहके निकट रख दी। उसने मुंहसे भी न लगाया। यद्यपि जमींदार तथा अन्यान्य मनुष्योंने उसको बहुत कुछ बढ़ावे दिये पर उसने रोटी नहीं खाई। जमींदारने कहा डब्बू ! तू घर चल, पर वह न आया। जमींदार फिर झिड़का। कहा कि, तू घर चल, तब घर आया। उस जमींदारकी स्त्री ने कहा कि, ऐ डब्बू ! क्या तुझे लज्जा नहीं आई कि, तू घर आया। इतनी बात सुनतेही फिर वह भाग कर उसी स्थान पर जा पड़ा। जमींदार लाख लाख बार उठाता, पर वह कुत्ता अपनी जगहसे हिलता नहीं था। उसी जगह पड़ा रहा, उसकी आंखोंसे आँसू निकलते थे। वह बिना खाये पीये उसी जगह पड़ा रोता रहा। अन्त चौथे दिवस उसी जलके किनारे मर गया। जमींदारने नवीन वस्त्रका कफन देकर पृथिवीमें उसे अपने हाथसे गाड़ दिया। ऋषि मुनि और सिद्ध साधु जो अपने कर्मोंके फलसे किसी पशुकी योनिमें जन्म लेते हैं तो भी उनके पूर्व जन्मके कार्य वैसेही उस जन्ममें भी रहते हैं।

दूसरा डब्बू—फीरोजपुर नगरके सोतियोंके महलामें एक डब्बू माकन कुत्ता था। वह एतवारका व्रत रखवा करता था, जो कोई उसके स्वामीसे लड़ता झगड़ता तो वह अवश्य ही काटता। बनाया हुआ भोजन रखकर घरके मनुष्य चले जाते वह उसकी रखवाली किया करता। किसी पशु अथवा मनुष्यको पास न आने देता, बहुत चौकसी रखता था। जो कार्य उससे कहा जाता वे वो सब ठीक ठीक किया करता था। जो मिहमान आते तथा बिदा होने लगते वो उनके वस्त्रका खूंट पकड़ लेता था। उस कुत्तेका यह तात्पर्य होता कि, वह रोटी खाकर जावे जब घरके मनुष्य कहते कि, डब्बू ! यह मिहमान भोजन कर चुका है इसको जाने दे तो वह उसको छोड़ देता घोड़ेकी बाग पकड़कर ले जाता उसको पानी पिलाया करता। वह कुत्ता मिट्टीके बरतनका हो अथवा गँदला जल हो कभी नहीं पीता था। मल त्यागके लिये बाहर दूर चला जाता था। स्वच्छ तथा पवित्र रहता था। चारपाई पर सोया करता था। चौकी पर बैठता था। मुसलमानका रोटी पानी व्यवहारमें कदापि नहीं लाता था। जब तक उसका स्वामी आज्ञा न देता तब तक कुछ नहीं खाता था।

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