कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिरुक्त, छन्द और ज्योतिष अपरा विद्या है—और जिसके द्वारा अक्षर (ब्रह्म) की प्राप्ति होती है वह पराविद्या है ॥ ५ ॥
विवेचन—इन दोनों प्रकारकी विद्या बतलाकर अङ्गिराऋषिने शौनकको बतलाया कि—अपने अंगो सहित चारों वेद अपरा अर्थात् इस पार अर्थात् संसारकी विद्या है—इससे अङ्गिराऋषिने साफ २ कहदिया कि, अपने अंगों—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपरा विद्या है, तो उससे निकले हुए अथवा उसके आधारसे बने हुए जितने शास्त्र पोथी और ग्रन्थ संसारमें हैं और होंगे वे सब अपरा विद्याकेही अन्तर्गत हैं और होंगे ।
परा विद्या तो केवल उसी नामका है जिससे अक्षर अर्थात् कभी न नाश होनेवाला जाना जाता है। इसका आशय यह है कि, उपर्युक्त वेदादिकों द्वारा अक्षर अविनाशी वस्तुकी प्राप्ति नहीं होसकती बरन क्षर और नाशमान् जो लोक परलोक आदि रूप संसार है, उसी की प्राप्ति वृद्धि आदि होसकती है । इसीसे इसे अपरा अर्थात् इसपारकी, नीचेकी अथवा प्राकृतिक, मायिक, संसारिकविद्या कहा । संसारमें रहनेवालोंको, सांसारिक उन्नति चाहने और परलोक जो स्वर्गीदि लोक हैं उनकी कामनावालोंको वेदों द्वारा अवश्य लौकिक पारलौकिक सर्व सुखोंकी प्राप्ति होती है । इसमें कोई सन्देह नहीं है । ऐसे इच्छानुसार सर्व सिद्धि देनेवाले वेदों और उनके मूल प्रणव (ओंकार) की प्रशंसा और बड़ाईमें परमानन्दजीने—कबीर भानुप्रकाश, कबीरमन्शूर, कबीरकौमुदी, तालीम कबीरकलियुग आदि सर्व ग्रन्थोंमें, पत्रोंके पत्र, अध्यायोंके अध्याय लिखा है हाँ । जहाँ परा विद्या की बात आती है, उसे आप स्वसम्बेदका नाम देते हैं और इन वेदादिकोंको परसम्बेदका नाम देकर, आप उपनिषत्के समानही साफ शब्दोंमें बतलाते हैं कि पराविद्या (स्वसम्बेद) की प्राप्ति सच्चे सद्गुरुकी कृपा बिना कदापि नहीं हो सकती चाहे कोई कितनाभी वेद शास्त्रादि पारंगत हो जावे किन्तु, सद्गुरुकी कृपा द्वारा स्वसम्बेदको जाने बिना काल (मन) के जालोंसे छुटकारा कदापि नहीं पा सकता ॥
इसी प्रकार उपनिषत्में बहुत स्थानोंमें इस विषयपर प्रकाश डाला गया है अब गीतामें क्या कहते हैं पाठक उसेभी देखलें —
देखो श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय—३
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्दो नित्यसत्त्वस्थो नियोगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥