कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजान पड़ता है। जब पूर्ण बुद्धिको प्राप्त हो जाती है तो गुलाबके फूलके समान खिला देख पड़ने लगता है।
प्राणधारी फूल।
इसी प्रकारके होते हैं इन्हींका यह भी एक प्रकार है उनमें सींग निकला होता है। इस प्रकारके फूल प्रायः पश्चिमी समुद्रोंके तटपर होते हैं।
एनथो जुआ—एक फूलका वृक्ष है, उसे भी प्राणधारी फूल कहते हैं। वह एनथो जुआ फूल भी है, जीवित स्वभाव भी रखता है। उसमें स्पर्श शक्ति जान पड़ती है। चलनशक्ति भी थोड़ी होती है, भोजन भी करता है। जो चूसता अथवा निगल जाता है उसको पचा भी लेता है। इस प्रकारसे यह फूल प्राणधारियोंकासा स्वभाव रखता है।
एनटेनिया—एक फूल होता है, प्रायः समुद्रोंके किनारे पत्थरोंके चट्टान पर पड़ा रहता है, उसकी उत्पत्ति भी चट्टानोंपर ही होती है। उसका रूप गाव-दुमाकार नलके समान होता है, जड़ गोल होती है, नलके नीचे जो पौला दीख पड़ता है वही उसका पेट है। यह प्राणधारी फूल उत्पन्न होकर अलग होता है, यह चिकना लचकदार शुद्ध साफ और प्रकाशित रहता है।
जो फिस्टस—एक जान दार फूल है यह जलमें होता है इसे प्राणधारी और फूल दोनों माना गया है, ये अनेक प्रकारके होते हैं, यह अंधेरी रातमें अपने मुखसे गंधका पदार्थ और प्रकाश प्रकट करता है जिसका प्रकाश चारों ओर फैल जाता है, उससे मल्लाहोंकी डोंगे रत्न जटित दीख पड़ती हैं। यह प्रकाश इन्हीं जानवरोंका है इनमें कितने ही छोटे तथा कितनेक बहुत बड़े होते हैं। ये पानीपर तैरते फिरते हैं कोई २ तो ऐसा जान पड़ता है कि, मानों अग्निका गोला जीवितहोकर पानीपर तैर रहा हो ये झुंडके झुंड एकही साथ तैरते फिरते हैं।
बेलिमेन्स।
एक प्रकारकी धातु अथवा पत्थरके टुकड़े होते हैं। ये प्रायः समुद्रके किनारे पेड़ रहते हैं, उनके देखनेसे बड़ा आश्चर्य होता है उनकी उत्पत्ति के विषयमें कुछ भी अनुमान नहीं हो सकता। विज्ञानिकोंकी बुद्धि भी चकमेमें पड़ी हुई है कि, उसको पत्थर धातु अथवा जानवर क्या कहा जावे। इसके विषयमें अनेक मतवाद हो रहा है, कोई पत्थर कहता है, कोई पथरीली चुम्बक बोलता है, कोई बिल्लोर सुनाता है, कोई धातु ठहराता है, कोई हड्डी बतलाता है। प्रत्यक्षमें तो एक हड्डीका टुकड़ा देख पड़ता है पर प्राणधारिये इसमें बहुत गुण जान पड़ते हैं यह जीवधारी पत्थर पानीपर तैरता है, इधरसे उधर जाकर अपना