भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कुछ कभी कुछ कानून प्रचलित करते हो, इसका क्या कारण है ? यथार्थमें इन नब्रियोंमेंसे किसीने भी खुदाको न जाना क्या ? भला जो खुदाको पहचाने वो ढोंगर, ढोर, कीड़े, मकोड़े इत्यादि तथा गृहकी पकी रोटी खावे ? पृश्चली स्त्रीसे मित्रता रखे ? उनकी पुत्रीसे विवाह करे ? किसीको जबह करने और कत्ल करनेकी आज्ञा दे ? कदापि नहीं । ईश्वर शुद्ध है उसका जाननेवाला भी शुद्ध होता है उसके कर्म भी शुद्ध और उज्ज्वल होते हैं ।

समता - मनुष्य और पशुओंका मांस एक समान है, जिसने एकका खाया उसने सबका खा लिया, देखो तौरीतमें इस तसनाका १२-बाब २०-से-२३ आयत तक लिखा है कि, खानेमें पाक और नापाक जानवर बराबर हैं यही बात इज्जीलमें रसूलोंके आमालमें इसी बाबमें लिखी है कि, जो कोई खाता है उसके लिये सब जीवधारी मनुष्यके मांसके समान है ।

कबीर साहब - जस मांस नर की, तस मांस पशुकी, मांस मांस एक सारा हो ।

सात्विक भोजन - जो ऋषीश्वर लोग जङ्गलमें रहते हैं वे साग, पात, कन्द, मूल, फल आदिक खाकर जीते हैं। उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध तथा हृदय प्रकाशमय और कान्ति तेज युक्त होती है । उन्हींको सब प्रकारकी सामर्थ्य मिलती है, तपस्या, भजन और संयम सब प्रकारकी शक्तिको प्रदान करता है । दानियल नबीकी किताब २ बाब-८२१ आयत तक देखो-दानियल नबी केवल फलियां खाकर दिन बिताता था, उसने कभी भी बादशाही भोजन स्वीकार नहीं किया, तिसपर भी उसका चेहरा बादशाही खाना खानेवालोंसे अधिक प्रकाशमान रहता था । नियुकद नजर बादशाहके सन्मुख परीक्षाके समय उसीको अधिक प्रतिष्ठा मिली । नबीसे बहुतसे आश्चर्यमय कौनक प्रगट हुये ।

धारणा - मांसाहारियोंके मनमें यह बात समाई हुई है कि, मांस खानेसे बल कान्ती बढ़ती है दानियल नबीकी उपरोक्त बातोंका विचार करें जाने कि, उनका कहना सब झूठ है ।

श्रेणियाँ और भोजन -- प्रथम श्रेणीमें पुण्य स्वरूप देवते हैं, उनको परमात्माने अमृत और कल्पवृक्ष प्रदान किया है । दूसरी श्रेणीमें मनुष्य हैं जिनको ईश्वरने अनाज फल शाक पात आदिक प्रदान किया है । तीसरी श्रेणी राक्षसोंकी है, जो कि, मांस शराबको ग्रहण करते हैं बुरे कर्मोंकोही अपना कर्तव्य समझते हैं इनमेंसे पहले श्रेणीवालोंको स्वर्ग मिलता है दूसरे मध्यमें रहते हैं एवं तीसरी श्रेणीवाले नरकमें पड़ते हैं ।

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