भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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थे उनके सैनिकोंको मांसको खानेसे, कामका वेग हुआ तो उन्होंने हुकुम दिया कि, जब आदमीको तीन रोज भूखे मरते बीत जाय खानेको कुछ न मिले, भूँखसे प्राणान्तकी दशा हो, तब चौथे दिन जो कुछ मिले खा लो, तो हलाल है मांस खाना ऐसेही समयके लिये हलाल हो सकता है ? दूसरे समयके लिये नहीं हो सकता । इसी प्रकार कितनी रीति रसम है जो किसी समय विशेषके लिये हैं दूसरे समयके लिये अनुचित हैं ।

पाक नापाककी समता—तौरीत और इञ्जीलसे प्रगट है कि, खाने में पाक और नापाक सब जीवधारी एक समान हैं । तौरीतमें तो कुछ विवरण भी है, पर इञ्जीलमें किसी प्रकारका बिलग विवरण नहीं है तो भी ईसाई लोग अपनी बुद्धिसे अपने भीतरी ईमानसे कुत्ता, बिल्ली, गदहा आदिक खाना नापसन्द करते हैं ।

निष्कर्ष—शिकारी पशु अर्थात् हिंसक जानवर और कञ्जरियाँ (वेश्यायें), जिनका कि गोशत खाना और वेश्यापन करनाही काम है, इनका अपराध तो शायद क्षमा हो भी, पर हिंसक और दुराचारी मनुष्य कभी क्षमा न किये जायेंगे । उनको ईश्वर अवश्य महान् दण्ड देगा । हाँ इतना तो है कि, जिस स्थानपर, अनाज घास, पात, फल, फूल, न होगा । प्रयत्नसे मिलना भी दुस्तर होगा वहाँके मनुष्य क्षमाके योग्य समझे जा सकते हैं ।

दोष—मांस अहारी अशुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं । प्रथम तो उनका मनही भक्तिमें नहीं लगता, उनमें सांसारिक छल, कपट और विषयवासनाकी प्रबल इच्छा होती है । यदि वे भक्तिकी ओर भी लगते हैं तो वाममार्गमें सम्मिलित होते हैं । मांस मदिरामेंही निमग्न रहकर तमोगुणी बने रहते हैं, उनको सत्तोगुणी भक्ति नहीं मिलती इसी कारण लोक परलोकसे सुख और मोक्ष यह भी प्राप्ति कभी नहीं होती ।

नानक०—जो पीते प्याले और खाते कबाब, सोदे खोरे लोगो वह होते खराब सो तोबा पुकारे कि, पावे निमाज, जो लेखा मँगीज क्या कीजे जबाब ॥

संस्कृतमें तम अज्ञानको कहते हैं इसीसे सारा संसार हुआ है । तमके न होतेही संसारका परदा नष्ट हो जाता है । फिर ज्ञान होकर मोक्ष मिल जाता है यह निश्चित बात है कि, मांस आदि तमोगुणी भोजनोंसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।

मनुष्यसे भेड़िया—मांस खानेकी इच्छा रखनेवाले हिंसक पशुओंकी योनिमें जाते हैं । नानक साहबकी जन्म साखीमें लिखा है किः— एक

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