कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1005, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १३७ )
आज्ञा रहै ब्रह्म बोध लावे । कोली चमार सबके घर खावे ॥ साखि हमार ले जिव समुझावै । असंख्य जन्ममें ठौर ना पावै ॥ बारवै पन्थ प्रगट है बानी । शब्द हमारेकी निर्णय ठानी ॥ अस्थिर घरका मरप न पावै । ये बार पंथ हमहीको ध्यावै ॥ बारहे पन्थ हमही चलि आवै । सब पथ मिट एकही पंथ चलावै ॥ तब लगि बोधो कुरी चमारा । फेरी तुम बोधो राज दर्बारा ॥ प्रथम चरन कलजुग स्रियाना । तब मगहर माडौ मैदाना ॥ धर्मरायसे मांडौ बाजी । तब धरि बोधो पंडित काजी ॥ बावन वीर कबीर कहाइ । भवसागरसों जीव सुकताइ ॥
कलियुगको अंत पठयते
ग्रहण परै चौंतीससो वारा । कलियुग लेखा भयो निर्धारा ॥ ३४०० ग्रहण परैसो लेखा कीन्हा । कलियुग अंतहु पियाना दीन्हा ॥ पांच हजार पाँचसौ पांचा । तब ये शब्द हो गया साँचा ५५०५ सहस्र वर्ष ग्रहण निर्धारा । आगम सत्य कबीर पोकारा ॥ तेरा वंश चले रजधानी । वंश चूरा मणि प्रगटे ज्ञानी ॥ तिनकी देह छायाँ नहिं होई । सर्वे पृथ्वी प्रमानिक सोई ॥
क्रिया सोगंद
धर्मदास मोरी लाख दोहाई । मूल शब्द बर जिन जाई ॥ पवित्र ज्ञान तुम जगमों भाखौ । मूलज्ञान गोइ तुम राखौ ॥ मूलज्ञान जो बाहेर परही । बिचले पीढी वंश हंस नहिं तरही ॥ तेतिस अर्व ज्ञान हम भाखा । मूलज्ञान गोए हम राखा ॥ मूलज्ञान तुम तब लगि छपाई । जब लगि द्वादश पंथ मिटाई ॥
द्वादशपंथका जाव अस्थान
द्वादश पंथ अंशनके भाई । जीवबांधि अपने लोक लेजाई ॥ द्वादश पंथमें पुरुष न पावै । जीव अंशमें जाइ समावै ॥