भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1007, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1007

बोधसागर

( १३९ )

अच्छर अच्छर अतीतकी बानी । निःअच्छर कोई बिरले जानी ॥ निःअक्षर की अक्षर श्वासा । नहीं धरनी नहीं गगन प्रकासा ॥ अक्षर तीनि लोक बिस्तारा । तामें अरुझो सब संसारा ॥ तीन सुत तेज अंडमों आई । आप आप इन्हें आप हटाई ॥ चार वेद कहै तिनकी साखी । अक्षर अतीत थापि उन्ह राखी ॥ अब भिन्न भिन्न कहूं अर्थीई । सात सुरतिके स्थान बताई ॥ अक्षर अतीत माया सो कहिये । सोई सुरति निरंजन लहिये ॥ अक्षर सुरति दुतिय है स्थाना । जिनके चार वेद परवाना ॥ शब्दातीत अनहद रहता । प्रेम धाम अक्षरकी चहता ॥ चार सुरतिका भेद नियारा । तीनि सुरतिका देउ विचारा ॥ पांचे सुरति अंकुरकी बानी । पांचे स्थान तेहि ठहरानी ॥ छटे स्थाना अंकुरकी है आपा । जेहिते सात करी उततापा ॥ सातवी सुरति सहजकी रही । उहि समरथको देखा सही ॥ सात सुरति सात है स्थाना । मूल सुरति है समर्थ प्रमाना ॥ सहज सुरति सब सुतं उपजाई । मूल सुरति लै हंस समाई ॥ मूल सुरति है सबको मूला । सात सुरतिको एक स्थूला ॥ सात सुरति मूल सिध सब माहीं । धर्मदास लखि राखौ ताहीं ॥ शब्द पांजी इतना परमाना । अब कहूं कायाकी बन्धाना ॥ सातों सुरति कायामें रहै । औ काया धरि बातें कहै ॥

सुरति स्थान

प्रथमहि दीप अमर मनियारा । तहैं वा मूल सुरति बैठारा ॥ दुसरा अजर दीप तहाँ कीन्हा । सहज सुरतिको बैठक दीन्हा ॥

चौपाई

तीसर दीप हिरण्मय सोई । सुरति अंकुरकी बैठक होई ॥ चौथे दीप सुरंग निर्मावा । ओहं सोहं तहाँ बैठवा ॥