भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1010, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1010

( १४२ )

कबीरबानी

मान तजी लेहि परमाना । खोवै जगतपान अभिमाना ॥ बचन बंशकी पारख पावै । सोइ हमारे बंश कहावै ॥ बचन बंश पारख नहिं होई । बंश हंस सब जाय विगोई ॥ बचन बन्धीए वंश अधिकारा । पारस सरूपी है संसार ॥ पार्स छुवे लोहा कँचन होई । पोहोष बास तिल भेदे सोई ॥ बचन वंश है पुरुष सनेही । कागरूपते हंस करि लेही ॥ सो सब उत्पत्ति कहो समुझाई । जो चीन्हे तो लोके जाई ॥ धर्मदास तुम पन्थके राजा । नाद बिंदु हम दोनों साजा ॥ तुम्हरे वंश पंथके कडिहारा । बचन वंश लोक सठिहारा ॥ सतगुरु बचन लेहि सिर नाई । तब तुमरे वंश करे गुरुवाई ॥

साखी-कहै कबीर

नाम नरायण जगदगुरु, करै बोध संसार । बचन प्रतापसे छूटहि, वो समर्थके कडिहार ॥

साखी-वंश अंसनके-धर्मदास उवाच ॥

धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ काया पांजीको भेद लखाओ । वंशअंश दोऊ तत समझावो ॥ वा सन्धि कहोजातेहोयउबारा । सोई भेद तुम कहो पुकारा ॥ धाम चारिका भर्म बताओ । कैसे कैलसो आनि समावो ॥ धर्मराय जो अपरबल बीरा । तीन लोकमें ताकी पीरा ॥ कैसे पंथ चले जगमाहीं । तीन लोकमें ताकी छाहीं ॥

साखी-पांजी भेद लखा न हो, वंश अंशनिर्धार ॥

इतनी संशय मिटावहु, सतगुरु हंस उबार ॥

साखी-कायापांजी-सतगुरु उवाच

धर्मदास कहौ समुझाई । काया पांजी आदि है भाई ॥ सुर नर मुनि कोई गम्य न पावा । झूठी आस बांध सब धावा ॥