कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1017, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १४९ )
कडिहार ओ हंस
वंश अंश मोहित कडिहारा । सदा हजुरी पलक न न्यारा ॥ वैसी चाल हंसकी होई । सदा हजुरी पलक दूरि न होई ॥
वंश अंश हंस प्रमाना
पीढी १
प्रथम वंश अंशकी बानी । बचन कडिहार एके प्रमानी ॥ दो सित्तर हंस तिन्ह तारै । अपने कर सब जीव उबारै ॥
पीढी २
दुसरे वंश अंश चलि आवै । पांच कडिहार निशानी लावै ॥ दूसरे वंश अंश अधिकारा । सातसौ तेरे जीव उबारा ॥
पीढी ३
तीसर वंश अंश जब दोई । नख कडिहार ताळुके होई ॥ हंस सोरासे लोक प्रमाना । १६०० । तिनके हाथ मुचन बन्धाना ॥
पीढी ४
चौथे वंश अंश जग आवै । भवसागरमो पीर कहावै ॥ तेरह सोहंस तीन कडिहारा । १३०३ । तिनके सङ्ग उत्तरि गयो पारा ॥
पीढी ५
तेहि पीछे काल अचरज होई । अंशाहि वंश विरोधे सोइ ॥ पांचवे वंश अंश परवाना । सात कडिहारा तिनके बन्धाना ॥ तीन हजार चारसै सोई । ३४०० । इतना हंस लोकको होई ॥
पीढी ६
छठे वंश अंश अधिकारा । ताते काल आनि पेठारा ॥ पुनि आवै पुरुषहि सहदानी । तरे कडिहार तिन्हके परवानी ॥ छःसै सत्तर सात हजार ७६७० । वंश अंश सङ्ग उत्तरे पारा ॥