भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १४९ )

कडिहार ओ हंस

वंश अंश मोहित कडिहारा । सदा हजुरी पलक न न्यारा ॥ वैसी चाल हंसकी होई । सदा हजुरी पलक दूरि न होई ॥

वंश अंश हंस प्रमाना

पीढी १

प्रथम वंश अंशकी बानी । बचन कडिहार एके प्रमानी ॥ दो सित्तर हंस तिन्ह तारै । अपने कर सब जीव उबारै ॥

पीढी २

दुसरे वंश अंश चलि आवै । पांच कडिहार निशानी लावै ॥ दूसरे वंश अंश अधिकारा । सातसौ तेरे जीव उबारा ॥

पीढी ३

तीसर वंश अंश जब दोई । नख कडिहार ताळुके होई ॥ हंस सोरासे लोक प्रमाना । १६०० । तिनके हाथ मुचन बन्धाना ॥

पीढी ४

चौथे वंश अंश जग आवै । भवसागरमो पीर कहावै ॥ तेरह सोहंस तीन कडिहारा । १३०३ । तिनके सङ्ग उत्तरि गयो पारा ॥

पीढी ५

तेहि पीछे काल अचरज होई । अंशाहि वंश विरोधे सोइ ॥ पांचवे वंश अंश परवाना । सात कडिहारा तिनके बन्धाना ॥ तीन हजार चारसै सोई । ३४०० । इतना हंस लोकको होई ॥

पीढी ६

छठे वंश अंश अधिकारा । ताते काल आनि पेठारा ॥ पुनि आवै पुरुषहि सहदानी । तरे कडिहार तिन्हके परवानी ॥ छःसै सत्तर सात हजार ७६७० । वंश अंश सङ्ग उत्तरे पारा ॥

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