कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1027, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १५९ )
आन दीपमों करै रजधानी । प्रथम भाषौ उनकी सहिदानी ॥ सदा रहै वह पुरुष हजूरी । उन हंसनकी कहो मत पूरी ॥
साखी-जेहि तुम बानी कहत हौ, मोहि सुनि होत अनन्द । पूरा सदगुरु पाइया, मिटे कालके फन्द ॥
चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच आनद्वीपके हंसनके वर्णनकी
अब सुनियो उन हंसनकी बानी । कुल करनीमें रहै लपटानी ॥ सहजभाव वोह भक्ति करैहीं । झूठ संसार सों रहै सनेहीं ॥ चौका आरति ज्ञान समाना । दोह दिशा वह रहै लपटाना ॥ इतनी वंश छाप अधिकाई । थोखे हंस नष्ट नहि जाई ॥ जिन्ह जैसी चाल प्रमाना । जो जस पहुंचे जाहि स्थाना ॥ जिन हंसन जैसो सुतन सवारा । जाहि दीपमें बास बसारा ॥ सब दीपनमें करै आनंदा । देहि कांत ऊगे रवि चन्दा ॥
विहंगमस्ती हंसके वर्णन
अब तुम सुनो उन हंसकी बानी । विहंग मताके हंस पहिचानी ॥ जगमें रहै कमल जस भाऊ । तन मन यौवन सब विसराऊ ॥ देहि इहां सुरती गुरुरचना । सूझै नहि सुखजीव न मरना ॥ जैसे सर्प कांचरी जानै । कायाको ऐसे करि मानै ॥ युक्ती युक्ती देह बनावै । जगका सुखनहि उनको भावै ॥ गुरु शिष्य एकै मत होही । एकै प्राण दाई है देही ॥ सो कडिहार गुह्य नहिं भाई । सोही जाने ताके ताई ॥ सोई हंस जानौ सब दूरी । जिन्हको कहिये पुरुषहजूरी ॥ नूतन सुरति है उनके पास । सो कडिहार रहत उरदासा ॥ ज्ञान ध्यान सदगुरु मन प्यारा । सदा हजर पलकनहि न्यारा ॥ युक्ति सांझि चरणामृत लेही । युक्तिहि युक्ति बनावै देही ॥ सदा रहे वह पुरुष हजूरा । छिन छिनदर्शपलक नहिं दूरा ॥