भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १६३ )

सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौ ग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महिते ले वसुदेव घर आवा । कर्म यशोदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ चराई । कर्मते गोपी केलि कराई ॥ कौशलया तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह बनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढ़ावा । कर्महिजनक सुता सिर नावा ॥ कर्म हरचो सीता कहैं आई । दुख सुख कर्मताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोई न मुक्ता । लछिमन राम करम फल भुगता ॥ कर्मसागर बांधेउ बन्ध कहिया । कर्महिजल जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लड़ाई । भला मिलाप हनू भेट चढ़ाई ॥ कर्मरेख नहिं मिटे मिटाई । जीव पपील लंका होय आई ॥ कर्मरेख लंकापति गयो । लंकापति बिभीषण भयो ॥ कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहा राम कह रावण राजा ॥ कर्मरेख सबहीं पर होई । देखो शब्द बिलोय बिलोई ॥ कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥

साखी-कर्म रेख सागर बँध्यो, सौयोजन मर्याद । विन अक्षर कोई ना छुटे, अक्षर अगम अगाध ॥

रमैनी

सागर भव सागर धारा । नहिं कुछ सूझे वार न पारा ॥ तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि बिलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं गाया । कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावैं । कर्म अकर्म मध्य दिखलावैं ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥