कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कर्मबोध
देखेगा । इस कारण वासनाओंके आनन्दसे दूर भागना चाहिये । हंस वही है कि, जो भवसागरके दूसरे जीवोंको कालके जालमें फँसा देखकर बुद्धिमानिसे दूर भाग जावे । जबलों मनुष्य अपने को जाग्रत अवस्थामें न अधिकृत करे तबलों मनुष्यता प्राप्त न करेगा । इस जीवको वासनासे नष्ट करके भवसागरमें बाँध रखा है । समस्त बुराई तथा बन्धनकी जड़ यही वासना है । इस मनके पाँच अहंकार हैं इन्हीं पाँचोंमें स्वामी तथा सेवक सभी फँसे हुये हैं ।
इति कर्मबोधे एकोनविंशस्तरंगः