कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1067, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १९९ )
भक्ति प्रवान कहौ समुझाई । कवन भक्ति सों जीव मुक्ताई ॥ तुम प्रभु हौ हंसनके नायक । पुरुष पुरातन जीवहित लायक ॥ भक्ति अँग मोहे देव बताई । तिहिं गहि हंसा लोक सिधाई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुन भक्ति विचारा । जासों उत्तर जाय भव पारा ॥ प्रथमहि पान प्रवाना पावै । साधनकी सेवा मन लावै ॥ सार शब्द घट रहे समोई । अक्षर भेद पावै जन कोई ॥ अमर वस्तु गुप्त हम राखा । ज्ञानी होय तेहि सों भाखा ॥ शब्द रूप निःअक्षर जानो । सो हंसा सत लोक पयानो ॥ इतना ज्ञान जाहि घट होई । अमर मूलको जाने सोई ॥
छन्द-ज्ञान पूरन होय जा घट पान नरिअर भक्ति हो । बिन ज्ञान नहिं भेद पावैं केते पद गुण शक्ति हो ॥ अमरमूल यह ग्रन्थ धर्मनि सुनियो चित्त लगायकै । जन्म २ को पाप नासै अमरलोक सिधायकै ॥
सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, किहिं विधि साधु कहावई । कहैं कबीर बखान, अमरमूल जाने बिना ॥
इति श्रीअमरमूल ग्रन्थ प्रथम विश्राम
ज्ञान भक्ति वर्णन
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । जीवन मुक्ति सो मोहे बताई ॥ नाम अमोल तत्त्व अति भारी । दुविधा माहिं जीव संचारी ॥ यह संशय मोहे निसदिन व्यापे । हरहु बेग गुरु यह संतापे ॥