कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1076, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २०८ )
अमरमूल
अब मैं वंशका कहों विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ आदि नाम आमोदिक शाखा । सोई शब्द वंश कहैं राखा ॥ साठ सभै बारह चौपाई । एही तत्त्व हंस घर जाई ॥ जब माली का भेदहि पावै । सत्य नाम में जाय समावै ॥ ऐसो भेद सुनौ धर्मदासू । जन्म जन्म की भेटत त्रासू ॥ सद्गुरु दया कर्म होय छीना । अमर होय नामहि लौ लीना ॥ संशय का मैं कहों ठिकाना । संशय काल घटमाहि समाना ॥ जबही पुरुष धर्म कहैं कीन्हा । तबही संशय उत्पन लीन्हा ॥ निः अक्षरकी परिचय पावै । संशय मिटे अमर घर जावै ॥ संशय को खंडित है ज्ञाना । ज्ञान हीन संशय लिपटाना ॥ संशय काल सबन कहैं खाई । निःसंशय हो नाम समाई ॥ संशय काल लखै नहि कोई । तातैं गण बिगोय बिगोई ॥ संशय नाम सुनौ धर्मदासू । एक नाम की राखहु आसू ॥ नाम छोड़ अन्तहि चित आनै । संशय तमहि पकर गहि तानै ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूढे सब हंसा ॥ सारखी-कहैं कबीर धर्मदाससों, संशय को विस्तार । एक नाम कहैं जानके, उतरहु भौ जल पार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी संशय उत्पानी । ज्ञान हीन सब जीवहि जानी ॥ विरला हंस होय अंकुरी । सो यह ज्ञान गहै निज मुरी ॥ ज्ञान लखे बिन मुक्ति न होई । तौ यह दुनियां जाय बिगोई ॥ नाम महातम भाख सुनावा । बिना नाम कोई पार न पावा ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह निज भेद कहौ तुमपासू ॥ ज्ञान हीन प्रानी जो होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥