कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २११ )
ज्ञानी सों कहिये उपदेशा । मूरख सों जिन कहौ संदेशा ॥ संशय कीन्ह सकल जग भंगा । काहु न चीन्हा संशय अंगा ॥
साखी-कहैं कबीर सो बाचि है, गुरु चरण चित दीन्ह ॥ अमर मूल निज शब्द है, हंसा चित गहि लीन्ह ॥
चौपाई
धर्मदास तुम करो विचारा । विना शब्द नहिं उत्तरौ पारा ॥ सार शब्द सों सब उपजावा । नारि पुरुष दोई निरमावा ॥ सूरज पुरुष चन्द्र है नारी । यह घटमें द्वै रूप सँवारी ॥ जैसे धातु कनककी एका । साँचा माही रूप अनेका ॥ पाप पुण्य रूपहि सों बांधी । कीन्ह धर्म यह अगम अगाधी ॥ पाप रू पुण्य भर्म है भाई । धर्म राय सब भर्म उपाई ॥ भर्म अमल तबही मिट जाई । सत्य नाम जब रहै समाई ॥ जब लग भर्म अमल है भाई । तब लग नाम बूझ नहिं जाई ॥ बूझ सीख गावै बहु भाँती । सुमरन भर्म करै दिनराती ॥ आप न चीन्हे मूढ़ गँवौरा । भर्मी भ्रम भूला संसारा ॥ धर्मदास तुम भर्महि छाड़ौ । निर्भय होय नाम चित माड़ौ ॥ जो तुम भर्म करो जो माहीं । तौ कस हंसन लोक कह जाहीं ॥ भर्म छोड़के भक्ति दढावहु । यह विधि हंसनलोक पठावहु ॥ तुम कहैं दीन्ह जक्तकी भारा । तुम्हरी मुहर चलै संसारा ॥ हाथ तुम्हार जीव सब तरहीं । भवसागर तैं हंस उबरहीं ॥ धर्मदास जग पारस देहू । जीव छुड़ाय काल सों लेहू ॥ पारस नाम कहेउ उपदेशा । मूरख सो जिन कहो संदेशा ॥
छन्द-ज्ञानी कहैं यह भेद धर्मनि देहु तुम समुझायकै ।
रहन गहन विवेक बानी कहहु सकल बुझायकै ॥