भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1083, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1083

बोधसागर

( २१६ )

गहि गुरुचरण बंदगी कीन्हा । चरण धोय चरणामृत लीन्हा ॥ बिन्ती कीन्ह चरण चितलाई । महा प्रसाद दीजिये साईं ॥ आमनिको अज्ञा तब दीन्हा । नाना व्यंजन तूर्तहि कीन्हा ॥ कंचन थार आरती चारी । सेवा बहुत हृदयमें धारी ॥ सुत नारी सब चरणन लागे । प्रेम प्रतीत भक्ति मन पागे ॥ चरणामृत सबही मिल लीन्हा । दिव्य ज्ञान सब कहैं कर दीन्हा ॥ साहिब चौका बैठे जाई । बहुत भौंति कर आसन लाई ॥ परस थार जब आमनि नारी । सुन्दर बदन प्राण अतिधारी ॥ मार मार प्रसाद लै खावहिं । प्रेमभाव साहिब मन भावहिं ॥ पाय प्रसाद पुनि अचवन लीन्हा । धर्मदास तब बिन्ती कीन्हा ॥ दया करहु अब मोपर स्वामी । बन्दी छोड़ु वर अनंतर जामी ॥ तब दीन्हऊँ प्रसाद गुसाईं । धर्मदास तब हवैं मन माईं ॥ जेतक साथ रहे घर नाहीं । वह सब आनंद भये मनमाहीं ॥ आमनि तबहीं पलंग बिछावा । सतगुरु तहां आन पौढावा ॥ धर्मदास तब पंख डुलावैं । आमनि चरण चापि सुख पावैं ॥ सकल साध हिल बंदगी कीन्हा । तन मन धन साहिब कहँ दीन्हा ॥ मेटी सकल जगतकी लाजा । ताते होय जीवको काजा ॥ धर्मनि तहां निछावर करहीं । बार बार बिन्ती अनुसरहीं ॥

साखी-यह तन लेव गुसाईं, जो होवे हम काज ।

तन मन धन कर निछावर, सुख संपति कुल लाज ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कर धर सिज्या पर बैठाया । अन्तर गति स्थिर ठहरावा ॥ जोई मुख सौं भीतर देखा । सबहि कसौटी कीन्ह परेखा ॥ साहिब तब ही दाय़ा कीन्हा । मस्तिक हाथ आमनिके दीन्हा ॥ जाहु न अपने घरके माहीं । सत्य तुम्हार देखे मन माहीं ॥