कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1085, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २१७ )
बालक तेरे वंशके हाथा । पंथ दीन्ह मैं तिनके हाथा ॥ मुक्ति जान कर राखै गोई । तेहि सम झोही और न कोई ॥ शब्द जान कर पन्थ चलावै । देश देश फिर सब समझावै ॥ तौन देश गैवनइ कराई । सुर्तन बन्त हंसन मुक्ताई ॥ पुरुष आज्ञा जो मोकहैं दीन्हा । मुक्ति भेदसों सब कहि दीन्हा ॥ सार शब्दका भेद जो पावा । यह सब ज्ञान तोहि समझावा ॥ बिना ना मिट है नहिं संशा । नाम जान सो हमरे वंशा ॥ नाम जान सो वंश करावै । नाम बिना सो मुक्ति न पावै ॥ वंश तुम्हार नाम जब पाई । भवसागरतें लोक सिधार्द ॥ नाम न जान करै अहंकारा । सो जिव परि है भवजलधारा ॥ नाम जान सो वंश हमारा । बिना नाम बूझा संसारा ॥ बिना नाम सबही अभिमानी । नाम प्रचय कोई कोई जानी ॥ नाम निहश्चर कहा बुझाई । अमरमूल महाँ देखो आई ॥ निह अक्षर को पावै भेदा । सोई हंसा होय अछेदा ॥
साखी-कहै कबीर विचारकै, निःअक्षरको भेद ।
निःअक्षर जो पावहीं, सोई हंस अछेद ॥
चौपाई
निह अक्षर तुम ज्ञान सुनाओ । जम्बू द्वीप हंस मुक्ताओ ॥ ऐसा धरम धरे जो कोई । निश्चय पार पाय है सोई ॥ तुम धर्मदास पन्थके राजा । तुम्हरे हाथ जीव को काजा ॥ यही मता हम तुम कहैं दीन्हा । दूसर कोइ न पावै चीन्हा ॥ अक्षर भेद बसै जिहि अंगा । निस बासर हम ताके संगा ॥ सत्य लोक महाँ वासा पाई । अमृत भोजन करै अघाई ॥
छन्द-यही महिमा जीव धरहै, बाम करै सतलोक हो ।
काल फन्दा काटकै लै, धरौ हँसन थोक हो ॥