कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २१९ )
जहां नाम तहां तुम नहीं कोई । विना नाम है तुम्हरी छोई ॥ यह विधि होय हंस परवाना । आवा गमन तासु नहीं जाना ॥
धर्मराय वचन
जेतिक नामे मुख सुन्न करिया । सो सब नाम हमारे धरिया ॥ जो कोई धर्म करही संसारा । सो सब मोर आहि व्यवहारा ॥ बहुत भाँति मैं फंदा कीन्हा । शंकर सहित बांध मैं लीन्हा ॥ कवन नाम हंसन मुक्ताओ । सो स्वामी मोहे भेद बताओ ॥
ज्ञानी वचन
नाम हमार पुरुषके केरा । वही नाम सों हंस उबेरा ॥ धर्मराय तुम ताहि न जाना । अपने अवगुण भये विगाना ॥ यही नाम आपन घट लेते । जीवन कष्ट नाहिं तुम देते ॥
धर्मराय वचन
परम पुरुष है मोरा नाऊँ । दूसर पुरुष कहाँ निर्माऊँ ॥ मोरे आगे कवन कहावा । सब कहँ मार जार भर्मावा ॥ तीन लोक महँ जीव पसारा । उन कहँ मार करौ संहारा ॥ ब्रह्मा पुत्र हमारो भयऊ । अंतकाल ताही दुख दयऊ ॥ शिवसमाधि कीन्हा अहँकारा । प्रलय काल करौ जर छारा ॥ विष्णु बड़े सबही में अंशा । तिनकहँ मार करौ निरवंशा ॥ अपने अंश यही गति दैहौँ । सृष्टि संहार प्रलयकर लैहौँ ॥ तुम तो आए हंस उबारन । कवन भाँति करिहौ जगतारन ॥
ज्ञानी वचन
धर्मराय कहँ तब ससुझाई । तुम जीवनके दुष्ट कहाई ॥ जब तुमकीन्ह चोरको काजा । तानैं पुरुष मोहिं उपराजा ॥ नाम एक मोहे दीन्ह अमोला । वोही नाम जिव बन्दी खोला ॥ ठाकुर नाम तुम्हारा होई । तीन लोक ठकुराह समोई ॥