भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( २२९ )

तबै पुरुष आज्ञा तेहि दीन्हा । सत्रह खण्ड राज्य तब दीन्हा ॥ तब तुम मान सरोवर जाई । कन्या देख बहुत सुख पाई ॥ पुरुष तोहि तब मार निकारा । तब हम भएऊ हंस रखवारा ॥ शब्द वार तब पुरुष सम्हारी । तुम्हरे टारे टरत न टारी ॥ मूल शब्दका का पावै भेदा । सोई हंसा होय अच्छेदा ॥ सोई भेद तुम नाहिंन पावा । कितनौ सेवा कर गुहरावा ॥ तुम कुबुद्धि औगुण बड़ कीन्हा । पुरुष आय पेल जो दीन्हा ॥ तबतै तुम्हरो भित्र पसारा । राज पसारेउ यह संसारा ॥ हम कहैं दया हंस की आई । दीन्ह पयान लोक तैं भाई ॥ बचन हमार मान सिर लीजै । शब्द खोजि अब नाहि करीजे ॥ जब तुम पाहौ शब्द ठिकाना । लोक तुम्हार न रहे निदाना ॥ सबै जीव सत लोकहि जाई । तुम्हरी नहीं रहै ठकुराई ॥ येही मन्त्र हमारो धरहू । शब्द खोज अब नाहीं करहू ॥ साखी-महा प्रलय जब होय है, देखि हो लोक हमार । तब हम तुम कहैं मिलिहिंगे, शब्द दोह टकसार ॥

चौपाई

सत्रह खण्ड तबहि मिटि जाई । रहै पुरुष तब शब्द समाई ॥ धर्मराय तुम पुरुष के अंशा । मिलहै शब्द मिटे सब संसा ॥ इतना वचन धर्म सौ कीन्हा । पीछे जगही प्याना कीन्हा ॥ ता पाछे संसारहि आये । पेडरमों बहु जीव छुड़ाये ॥ चार सिद्ध पर्वत पर पाये । तिनसों ज्ञान भेद समुझाये ॥ चारौ सिद्ध काल सों बाचा । दिव्य ज्ञान हृदय मंह साचा ॥ ता पीछे तुम्हरे ढिग आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । है सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ अगम ज्ञान तुममोहिं लखावा । हृदय कमल तुम मोर छुड़ावा ॥